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उर्दू-हिंदी एकता: क़ायदे उर्दू शमीम अहमद का पूर्वी चंपारण दौरा, भाषा विकास पर ज़ोर

उर्दू-हिंदी एकता पर जोर देते हुए शमीम अहमद का पूर्वी चंपारण दौरा, भाषाई सद्भाव और सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने का संदेश।

उर्दू-हिंदी एकता को सांस्कृतिक विरासत बताते हुए भाषाई सद्भाव का संदेश

कलम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
पटना, 30 अप्रैल 2026

उर्दू-हिंदी एकता के संदेश के साथ 29 अप्रैल 2026 को बिहार के ऐतिहासिक जिला पूर्वी चंपारण के कलेक्ट्रेट में हिंदी-उर्दू अकादमी के चेयरमैन क़ायदे उर्दू शमीम अहमद का आगमन हुआ, जहां जिला उर्दू भाषा सेल के अधिकारियों और कर्मियों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। इस अवसर पर एडीएम सिबगतुल्लाह, डिप्टी इलेक्शन ऑफिसर सरफराज नवाज़, इंचार्ज उर्दू सेल, उर्दू अनुवादक गुलाम रब्बानी, उबैदुर रहमान, जेडीयू के माइनॉरिटी सेल के राज्य सचिव निसार अहमद और अन्य अधिकारी उपस्थित थे।

औपचारिक परिचय के बाद शमीम अहमद ने अपने संबोधन में कहा कि भाषा मानव संचार का मूल माध्यम है और मातृभाषा का विकास किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक नींव को मजबूत करता है। उन्होंने उर्दू-हिंदी एकता को एक साझा सांस्कृतिक विरासत बताते हुए कहा कि दोनों भाषाएं एक ही सांस्कृतिक धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं और इन्हें विभाजन के बजाय एकता का माध्यम बनाया जाना चाहिए।

शमीम अहमद पिछले लगभग तीन दशकों से भारतीय भाषाओं, विशेषकर उर्दू और हिंदी के विकास के लिए सक्रिय हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि उर्दू किसी एक वर्ग या धर्म की भाषा नहीं बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत है। इसी संदर्भ में वे अक्सर अमीर खुसरो का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने हिंदवी भाषा में कविता करके इस साझा भाषाई परंपरा को मजबूत किया। उनके अनुसार खुसरो की रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि उर्दू और हिंदी की जड़ें एक ही सांस्कृतिक भूमि में निहित हैं।

अपने विचार को स्पष्ट करने के लिए वे कबीर का भी उल्लेख करते हैं, जिन्होंने सरल जनभाषा में दोहे कहकर समाज के विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के करीब लाने का कार्य किया। शमीम अहमद के अनुसार कबीर की भाषा उस साझा परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है जिससे आगे चलकर उर्दू और हिंदी ने अपना स्वरूप ग्रहण किया।

उनकी प्रमुख उपलब्धियों में पश्चिम बंगाल में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने का आंदोलन शामिल है, जिसे भाषाई राजनीति में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। वे लगातार इस बात के समर्थक रहे हैं कि हिंदी को राष्ट्रीय भाषा और उर्दू को दूसरी राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाए ताकि देश में भाषाई सौहार्द को बढ़ावा मिल सके।

शमीम अहमद का मानना है कि उर्दू और हिंदी दो अलग भाषाएं नहीं बल्कि एक ही सांस्कृतिक परंपरा के दो रूप हैं। वे इस विचार का विरोध करते रहे हैं कि भाषाओं को धर्म के आधार पर विभाजित किया जाए। उनके अनुसार यह विभाजन औपनिवेशिक काल की देन है जिसने सामाजिक एकता को नुकसान पहुंचाया।

उन्होंने अपने भाषणों और जन अभियानों के माध्यम से यह संदेश फैलाया कि भाषाएं लोगों को जोड़ती हैं और उर्दू व हिंदी का विकास वास्तव में भारतीय संस्कृति की रक्षा के समान है। शैक्षणिक संस्थानों, साहित्यिक सभाओं और सरकारी स्तर पर भी वे उर्दू के उपयोग को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयासरत रहे हैं।

उर्दू

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि यदि भाषाओं के बीच कृत्रिम दीवारें समाप्त कर दी जाएं तो राष्ट्रीय एकता को मजबूत किया जा सकता है। कार्यक्रम के अंत में एडीएम और डिप्टी इलेक्शन ऑफिसर द्वारा शमीम अहमद को ‘उर्दू दुनिया’, ‘बच्चों की दुनिया’ और ‘जिला उर्दू नामा’ भेंट स्वरूप प्रदान किए गए, जिसके साथ यह कार्यक्रम सौहार्दपूर्ण वातावरण में समाप्त हुआ।

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