सांप्रदायिक सौहार्द पर आज़मी बारी का बड़ा बयान। ईद-उल-अज़हा, भाईचारे, धार्मिक सम्मान और देश में बढ़ती हिंसा पर जताई चिंता, शांति और इंसानियत बनाए रखने की अपील।
ईद-उल-अज़हा को भाईचारे और इंसानियत का पर्व बताते हुए सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की अपील
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
पटना | 24 मई 2026
सांप्रदायिक सौहार्द किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत होती है और भारत जैसे विविधताओं वाले राष्ट्र में इसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है। वरिष्ठ सामाजिक और राजनीतिक नेता आज़मी बारी ने कहा कि देश में शांति, भाईचारा और आपसी सम्मान बनाए रखना हर नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि यदि किसी सुझाव या पहल से समाज में बढ़ती नफरत, हिंसा और मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को रोकने में मदद मिलती है, तो उस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
समाज में बढ़ती कट्टरता पर जताई चिंता

आज़मी बारी ने कहा कि हाल के वर्षों में गाय के नाम पर होने वाली हिंसा और हत्याओं ने पूरे समाज को चिंता में डाल दिया है। कुछ लोग धार्मिक भावनाओं को आधार बनाकर समाज में नफरत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे सामाजिक सौहार्द कमजोर हो रहा है। उन्होंने कहा कि किसी भी इंसान की जान सबसे कीमती होती है और किसी भी परिस्थिति में हिंसा को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने कहा कि देश के अनेक लोग गाय को आस्था और श्रद्धा का प्रतीक मानते हैं, इसलिए मुस्लिम समाज को भी उनके धार्मिक जज़्बात और भावनाओं का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने अपील की कि ईद-उल-अज़हा के मौके पर ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे सामाजिक तनाव बढ़े या किसी समुदाय की भावनाएं आहत हों।
सांप्रदायिक सौहार्द के लिए आपसी सम्मान बेहद जरूरी
आज़मी बारी ने कहा कि भारत सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब और विविध संस्कृतियों का देश रहा है। यहां अलग-अलग धर्मों, भाषाओं और परंपराओं के लोग मिल-जुलकर रहते आए हैं। ऐसे में हर नागरिक का यह दायित्व है कि वह दूसरे धर्म और समुदाय की भावनाओं का सम्मान करे।
उन्होंने कहा कि इस्लाम अमन, इंसानियत और सहिष्णुता का संदेश देता है। किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या मानवता के खिलाफ अपराध है। यदि समाज में बढ़ रही नफरत और हिंसा को रोकने के लिए कोई संवैधानिक और प्रभावी रास्ता निकलता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए।
कुर्बानी का असली संदेश त्याग और इंसानियत
उन्होंने कहा कि ईद-उल-अज़हा केवल कुर्बानी का पर्व नहीं, बल्कि त्याग, भाईचारे और इंसानियत का संदेश देने वाला त्योहार है। इसे किसी भी प्रकार के विवाद या सांप्रदायिक तनाव का कारण नहीं बनना चाहिए।
आज़मी बारी ने सरकार, सामाजिक संगठनों और धार्मिक नेताओं से अपील की कि वे मिलकर ऐसा माहौल तैयार करें, जहां हर नागरिक खुद को सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र महसूस कर सके। उन्होंने कहा कि देश की तरक्की तभी संभव है, जब समाज में शांति और आपसी विश्वास कायम रहे।







