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समाजवाद का संध्या काल: बिहार में समाजवाद की आख़िरी चमक

बिहार में समाजवाद का संध्या काल— नीतीश कुमार के बाद विचारधारा का भविष्य।

नीतीश कुमार के प्रस्थान के साथ क्या समाजवाद विचारधारा इतिहास बन रही है?

Qalam Times News Network
पटना | 16 अप्रैल 2026

समाजवाद— यह केवल एक राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि बिहार की सामाजिक संरचना, संघर्ष और सशक्तिकरण की पहचान रहा है। आज, जब नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा की राह चुनी है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बिहार में समाजवाद का युग अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। यह घटना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उस वैचारिक विरासत के धुंधलाने का संकेत है, जिसने दशकों तक राज्य की राजनीति को दिशा दी।

समाजवाद
बिहार में समाजवाद की जड़ें 1974 के जेपी आंदोलन से जुड़ी हैं, जिसने राजनीति को जनसंघर्ष और सामाजिक न्याय के नए आयाम दिए। इसके बाद लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार जैसे नेताओं ने इस विचारधारा को जमीन पर उतारा। पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की आवाज को सत्ता के केंद्र तक पहुंचाने का जो प्रयास हुआ, वह भारतीय राजनीति में एक मिसाल बना। लेकिन आज वही धारा नेतृत्व के अभाव में कमजोर पड़ती दिख रही है।
नीतीश कुमार को “समाजवाद का अंतिम चिराग” कहना अतिशयोक्ति नहीं है। उन्होंने अपने लंबे राजनीतिक जीवन में न केवल इस विचारधारा को जीवित रखा, बल्कि बदलते समय के साथ उसे संतुलित भी किया। हालांकि, उनकी राजनीति में व्यावहारिकता और समझौते भी रहे, लेकिन उनका मूल आधार हमेशा सामाजिक न्याय ही रहा। अब, उनके सक्रिय राजनीति से हटने के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि इस विचारधारा को आगे कौन ले जाएगा।
बिहार की राजनीति में अब एक स्पष्ट वैचारिक बदलाव दिख रहा है। भाजपा के उभार और सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार का गठन इस बात का संकेत है कि राज्य अब समाजवाद से हटकर एक अलग राजनीतिक दिशा की ओर बढ़ रहा है। विकास, राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति अब केंद्र में है, जबकि समाजवाद की भाषा धीरे-धीरे हाशिए पर जाती नजर आ रही है।
ललन पासवान का यह कहना कि समाजवाद का अब एक ही वाहक बचा है, उस चिंता को दर्शाता है जो इस विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच गहराती जा रही है। जब एक विचारधारा अपने प्रमुख चेहरों को खो देती है, तो वह केवल सिद्धांत बनकर रह जाती है। बिहार में भी कुछ ऐसा ही होता दिख रहा है।

समाजवाद समाजवाद
बिहार हमेशा से सामाजिक परिवर्तन की भूमि रहा है— एक ऐसी पाठशाला, जहां से देश ने सामाजिक न्याय और समाजवाद की राजनीति सीखी। इसी धरती ने Ram Manohar Lohia जैसे महान चिंतक को जन्म दिया, जिन्होंने बराबरी और पिछड़े वर्गों के अधिकारों को वैचारिक आधार दिया। इसके बाद Jayaprakash Narayan ने 1974 के आंदोलन के जरिए राजनीति को जनांदोलन का रूप दिया और सत्ता के खिलाफ जनता की ताकत को स्थापित किया। आगे चलकर Lalu Prasad Yadav ने सामाजिक न्याय को व्यवहार में उतारते हुए हाशिए पर खड़े वर्गों को सत्ता में भागीदारी दिलाई, जबकि George Fernandes जैसे नेताओं ने मजदूरों, किसानों और आम आदमी के हक़ की लड़ाई को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती दी।
लेकिन आज वही पाठशाला एक नए दौर की ओर बढ़ रही है। सवाल यह है कि क्या यह नया अध्याय समाजवाद के उन मूल सिद्धांतों— समानता, सामाजिक न्याय और जनभागीदारी— को साथ लेकर आगे बढ़ेगा, या फिर इन महान नेताओं की विरासत केवल इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह जाएगी?
अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि नीतीश कुमार का जाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि समाजवाद के एक पूरे अध्याय का समापन है। अब बिहार की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर है, जहां उसे तय करना है कि वह अपनी वैचारिक विरासत को संभाले रखेगा या एक पूरी तरह नई दिशा में आगे बढ़ेगा।

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