पत्थर नाटक की प्रभावशाली प्रस्तुति ने भय, मानसिक कैद और सामाजिक दबावों को मंच पर जीवंत किया। लिटिल थेस्पियन के ‘पत्थर’ और ‘वे आँखें’ ने दर्शकों को गहन आत्ममंथन और सामाजिक यथार्थ से रूबरू कराया।
लिटिल थेस्पियन के नाटक ‘पत्थर’ और संतोषपुर अनुचिंतन की प्रस्तुति ‘वे आँखें’ ने दर्शकों को आत्ममंथन और सामाजिक यथार्थ से कराया रूबरू
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता, 13 जून 2026
पत्थर केवल एक नाटक नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर जन्म लेने वाले भय, असुरक्षा और मानसिक कैद की गहरी पड़ताल है। 12 जून 2026 को शाम 6:30 बजे अनुचिंतन आर्ट सेंटर में लिटिल थेस्पियन द्वारा प्रस्तुत यह नाट्य कृति दर्शकों को लगभग 40 मिनट तक अपनी पकड़ में बांधे रखती है। प्रस्तुति समाप्त होने के बाद भी इसकी संवेदनाएं लंबे समय तक मन में बनी रहती हैं। यही किसी सफल रंगमंचीय प्रस्तुति की सबसे बड़ी पहचान है।
इस नाटक की कहानी एक साधारण दंपति के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनका सामान्य जीवन अचानक उस समय बदल जाता है जब उनके घर के दरवाजे के सामने एक रहस्यमयी और अदृश्य “पत्थर” आकर खड़ा हो जाता है। शुरुआत में यह केवल एक भौतिक बाधा प्रतीत होती है, लेकिन धीरे-धीरे उसका स्वरूप भय, सामाजिक दबाव, मानसिक जड़ता और अवसाद जैसे अनेक प्रतीकों में बदल जाता है। घर से बाहर निकलना उनके लिए असंभव सा हो जाता है और उनका संसार सिमटता चला जाता है।
निर्देशक डॉ. गौरव दास ने पत्थर की केंद्रीय प्रतीकात्मकता को किसी कृत्रिम व्याख्या में बांधने के बजाय उसे स्वाभाविक रूप से विकसित होने दिया है। यही कारण है कि यह नाटक एक ओर जहां अमूर्त और प्रतीकात्मक लगता है, वहीं दूसरी ओर जीवन की कठोर वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ा हुआ भी दिखाई देता है। मंच पर निर्मित वातावरण दर्शकों को पात्रों की मानसिक कैद का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है।

मुख्य भूमिकाओं में गुंजन अज़हर और मोहम्मद आसिफ अंसारी ने अत्यंत संतुलित और प्रभावशाली अभिनय प्रस्तुत किया। गुंजन ने पत्नी के चरित्र में झुंझलाहट से लेकर भय और फिर भावनात्मक शून्यता तक की यात्रा को बेहद सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया। वहीं आसिफ ने पति की भूमिका में आत्मविश्वास के मुखौटे और भीतर छिपी असहायता के बीच के संघर्ष को प्रभावशाली ढंग से उकेरा। दोनों कलाकारों की खामोशियां भी संवादों जितनी ही प्रभावशाली रहीं और उनके अभिनय ने रिश्ते की वास्तविकता को मंच पर जीवंत बना दिया।
प्रकाश योजना में राहुल सरदार ने वातावरण को सशक्त बनाया, जबकि बिप्लब नस्कर के संगीत ने प्रस्तुति की भावनात्मक गहराई को और समृद्ध किया। समर मृधा और नयन सदक की कोरियोग्राफी ने दृश्य संरचना को प्रभावी रूप प्रदान किया।
नाटक एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—क्या हमारी राह में मौजूद बाधाएं वास्तव में वास्तविक हैं, या फिर हम स्वयं अपने भीतर ऐसी दीवारें खड़ी कर लेते हैं जिनसे बाहर निकलना हमें असंभव लगने लगता है? महामारी के बाद के दौर में, जब अनेक लोग मानसिक तनाव, असुरक्षा और सामाजिक दबावों से जूझ रहे हैं, यह प्रस्तुति और भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है।
‘पत्थर’ की प्रस्तुति के बाद संतोषपुर अनुचिंतन ने सुमित्रानंदन पंत की कविता पर आधारित नाट्य प्रस्तुति ‘वे आँखें’ मंचित की। जहां पहला नाटक व्यक्ति के भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है, वहीं ‘वे आँखें’ समाज की ओर देखने और उसके यथार्थ को समझने का आग्रह करती है।

डॉ. गौरव दास द्वारा नाट्य रूपांतरित और निर्देशित इस प्रस्तुति में एक किसान के संघर्ष, श्रम, भूमि से उसके संबंध और उसके जीवन में व्याप्त असुरक्षा तथा शोषण को मार्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया। समाज का आधार माने जाने वाले किसान की पीड़ा और संघर्ष को मंच पर अत्यंत संवेदनशीलता के साथ उभारा गया।
प्रस्तुति की विशेषता डॉ. गौरव दास की स्वयं की स्वरबद्ध पृष्ठभूमि गायन भी रही, जिसने पूरे नाटक को लोक-संवेदना और भावनात्मक गहराई प्रदान की। समर मृधा, नयन सदक, मेहली दास, अनिकेत मजूमदार, अकुलिना मित्रा, तृषा दास, पार्थो पाइक और रंजीता रॉय ने अपने-अपने पात्रों को पूरी निष्ठा के साथ निभाया। प्रकाश एवं मंच सज्जा का दायित्व बिप्लब नस्कर ने संभाला।
दोनों प्रस्तुतियों को एक साथ मंचित करने का निर्णय अत्यंत सार्थक साबित हुआ। एक ओर ‘पत्थर’ मनुष्य की आत्मनिर्मित कैद की कहानी कहता है, तो दूसरी ओर ‘वे आँखें’ समाज द्वारा निर्मित असमानताओं और बंधनों को सामने लाता है। इन दोनों प्रस्तुतियों का यह विरोधाभासी लेकिन पूरक संयोजन दर्शकों को गहन चिंतन के लिए प्रेरित करता है।







