हज किराया विवाद के बीच सरकार ने 10,000 रुपये अतिरिक्त शुल्क लगाया, यात्रियों पर बढ़ा बोझ और फैसले को लेकर देशभर में बहस तेज।
सरकार ने वैश्विक कारण बताए, विपक्ष और संगठनों ने फैसले को बताया अनुचित
कलम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली, 1 मई 2026
हज किराया विवाद के बीच केंद्र सरकार के एक फैसले ने हजारों हज यात्रियों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस वर्ष हज यात्रा पर जाने वाले प्रत्येक यात्री को अतिरिक्त 10,000 रुपये जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार की ओर से कहा गया है कि यह राशि 15 मई तक जमा करनी होगी। इस अचानक लिए गए निर्णय ने देशभर में चर्चा और असंतोष का माहौल बना दिया है।

सरकारी पक्ष से सफाई देते हुए बताया गया कि पश्चिम एशिया में चल रही अस्थिरता के कारण विमान ईंधन की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी हुई है, जिसका सीधा असर हज यात्रा के खर्च पर पड़ा है। अधिकारियों के अनुसार, एयरलाइंस कंपनियों ने शुरू में प्रति यात्री 300 से 400 डॉलर अतिरिक्त शुल्क लेने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन हज किराया विवाद को ध्यान में रखते हुए केंद्र के हस्तक्षेप से इसे घटाकर लगभग 100 डॉलर तक सीमित किया गया। सरकार का कहना है कि यह कदम परिस्थितियों को देखते हुए जरूरी था और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखी गई है।
इसके बावजूद इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई नेताओं का कहना है कि यात्रा से ठीक पहले अतिरिक्त पैसे की मांग करना यात्रियों के साथ अन्याय है। उनका सवाल है कि यदि खर्च बढ़ने की आशंका पहले से थी, तो इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई।

धार्मिक संगठनों ने भी इस फैसले पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि हज यात्रा के लिए लोग वर्षों तक बचत करते हैं, ऐसे में अचानक अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना उनके लिए गंभीर परेशानी खड़ी करता है। कई लोगों के लिए यह अतिरिक्त राशि जुटाना आसान नहीं है।
वहीं कुछ राजनीतिक नेताओं ने इसे गरीब यात्रियों के लिए बाधा बताया है। उनका कहना है कि पहले ही बड़ी राशि जमा कराने के बाद अब और पैसे मांगना सही नहीं है। उन्होंने सरकार से इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
सरकार की ओर से यह भी कहा गया है कि बढ़ती लागत का बड़ा हिस्सा खुद वहन किया जा रहा है ताकि यात्रियों पर ज्यादा दबाव न पड़े। अधिकारियों का दावा है कि वास्तविक बढ़ोतरी इससे कहीं अधिक हो सकती थी, लेकिन उसे सीमित रखा गया है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों में समय और पारदर्शिता का और बेहतर ध्यान रखा जाना चाहिए था।






