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Homeबंगालकुल्लियात-ए-मौलाना आज़ाद का ऐतिहासिक विमोचन, कोलकाता में जुटे देशभर के विद्वान

कुल्लियात-ए-मौलाना आज़ाद का ऐतिहासिक विमोचन, कोलकाता में जुटे देशभर के विद्वान

कुल्लियात-ए-मौलाना आज़ाद के पहले दो खंडों का कोलकाता में भव्य विमोचन। अल-हुदा रिसर्च पब्लिकेशन्स द्वारा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की साहित्यिक और वैचारिक विरासत को संरक्षित करने की ऐतिहासिक पहल।

अल-हुदा रिसर्च पब्लिकेशन्स ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की बौद्धिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में उठाया बड़ा कदम

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता | 25 मई 2026

कुल्लियात-ए-मौलाना आज़ाद के पहले दो खंडों का भव्य लोकार्पण

कोलकाता में आयोजित एक गरिमामय समारोह में “कुल्लियात-ए-मौलाना आज़ाद” के पहले दो खंडों का आधिकारिक विमोचन किया गया। यह विशाल अकादमिक परियोजना मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की वैचारिक, साहित्यिक और शैक्षणिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे शिक्षाविदों, साहित्यकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक हस्तियों ने भाग लेकर इस प्रयास की सराहना की।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेता, प्रखर चिंतक, पत्रकार और उच्चकोटि के लेखक के रूप में याद किया जाता है। उन्होंने अपने क्रांतिकारी अख़बार अल-हिलाल और अल-बलाग़ के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ वैचारिक संघर्ष को नई दिशा दी। यही कारण है कि कुल्लियात-ए-मौलाना आज़ाद केवल एक पुस्तक परियोजना नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की बौद्धिक विरासत को संजोने का गंभीर प्रयास बन गई है।
बिखरे साहित्य को एक मंच पर लाने की कोशिश
मौलाना आज़ाद का साहित्य लंबे समय से विभिन्न स्थानों पर बिखरा हुआ था। उनके लेख, भाषण, पत्र और वैचारिक सामग्री अलग-अलग स्रोतों में मौजूद होने के कारण शोधार्थियों को व्यापक अध्ययन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इस चुनौती को स्वीकार करते हुए ‘अल-हुदा रिसर्च पब्लिकेशन्स’ ने मौलाना ज़की अहमद मदनी के नेतृत्व में इस परियोजना की शुरुआत की।
इस महत्वपूर्ण कार्य में युवा शोधकर्ता और संपादक डॉ. रफ़ीउल्लाह मसूद तैमी ने प्रमुख भूमिका निभाई। लगभग सात दशक बाद मौलाना आज़ाद की रचनाओं को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करना अकादमिक जगत में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
विद्वानों ने बताया ऐतिहासिक उपलब्धि

कुल्लियात कुल्लियात
पटना ओरिएंटल कॉलेज के उर्दू विभाग के प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद शकील अहमद क़ासमी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी बड़े बौद्धिक कार्य के पीछे दूरदर्शी लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने मौलाना ज़की अहमद मदनी की प्रशंसा करते हुए कहा कि यदि उनका सहयोग न होता, तो यह परियोजना संभवतः इतनी व्यवस्थित रूप में सामने नहीं आ पाती।
उन्होंने कहा कि मौलाना मदनी केवल एक शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि ज्ञान और शोध को बढ़ावा देने वाले दूरदर्शी संस्था-निर्माता भी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि डॉ. रफ़ीउल्लाह तैमी के शोध कार्य में पारंपरिक और आधुनिक शिक्षा का बेहतरीन संतुलन दिखाई देता है।
संपादन और शोध प्रक्रिया रही चुनौतीपूर्ण
कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. रफ़ीउल्लाह मसूद तैमी ने बताया कि इस परियोजना का उद्देश्य मौलाना आज़ाद की समस्त वैचारिक धरोहर को एक स्थान पर उपलब्ध कराना है, ताकि नई पीढ़ी उनके चिंतन को बेहतर ढंग से समझ सके।
उन्होंने कहा कि संपादन के दौरान कठिन शब्दों के अर्थ, क़ुरआनी आयतों के संदर्भ, हदीसों की तख़रीज और ऐतिहासिक तथ्यों के सत्यापन का विशेष ध्यान रखा गया है। शोधार्थियों और पाठकों की सुविधा के लिए पुस्तक को अकादमिक मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है।
समकालीन भारत में आज़ाद के विचारों की प्रासंगिकता

कार्यक्रम में कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रो. इम्तियाज़ वाहिद और प्रो. उमर ग़ज़ाली सहित कई शिक्षाविदों ने दोनों खंडों की अकादमिक गुणवत्ता की सराहना की। वक्ताओं ने कहा कि मौलाना आज़ाद की सोच आज भी भारतीय समाज के लिए बेहद प्रासंगिक है।
प्रसिद्ध चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. फुआद हलीम ने कहा कि वर्तमान भारत जिन सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनके समाधान के लिए मौलाना आज़ाद की वैचारिक दृष्टि मार्गदर्शक साबित हो सकती है। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सद्भाव के लिए आज़ाद के विचारों को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
प्रेरणादायक माहौल में संपन्न हुआ समारोह
समारोह में बड़ी संख्या में साहित्यकारों, पत्रकारों, शोधार्थियों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति ने आयोजन को यादगार बना दिया। सभी वक्ताओं ने इस परियोजना को उर्दू साहित्य और भारतीय बौद्धिक इतिहास की अमूल्य धरोहर करार दिया।
अल-हुदा रिसर्च पब्लिकेशन्स के इस प्रयास को शिक्षा और शोध की दुनिया में एक नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है।

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