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‘झंडा यूनियनों’ से तबाह हुईं फैक्ट्रियां, ट्रेड यूनियनों पर CJI सूर्यकांत की सख्त टिप्पणी ने मचाया बवाल

CJI सूर्यकांत ने ट्रेड यूनियनों पर साधा निशाना, कहा झंडा यूनियनों से बंद हुईं फैक्ट्रियां। घरेलू कामगारों की न्यूनतम मजदूरी याचिका खारिज, औद्योगिक विकास रुकने का आरोप।

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली, 30 जनवरी 2026

ट्रेड यूनियनों को लेकर CJI का तीखा रुख

ट्रेड

ट्रेड यूनियनों की भूमिका को लेकर देश की न्यायपालिका के शीर्ष पद से एक विवादास्पद बयान सामने आया है। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कहा कि देश में औद्योगिक इकाइयों के बंद होने और आर्थिक विकास में बाधा के लिए ट्रेड यूनियनों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। यह टिप्पणी घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन निर्धारण की मांग वाली एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई।

CJI सूर्यकांत ने अपनी कड़ी प्रतिक्रिया में कहा कि पारंपरिक उद्योग धंधे तथाकथित ‘झंडा यूनियनों’ के कारण समाप्त हो गए हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ट्रेड यूनियनों के नेता देश की औद्योगिक प्रगति में रुकावट डालने के लिए अधिकांशतः उत्तरदायी हैं। न्यायमूर्ति ने यह भी जोड़ा कि मजदूरों के शोषण को रोकने के अन्य प्रभावी माध्यम अपनाए जाने चाहिए, जैसे कि श्रमिकों को उनके वैयक्तिक अधिकारों के प्रति सचेत करना और उन्हें अधिक कुशल बनाना।

याचिका का विषय क्या था?

तमिलनाडु की पेन थोजिलारगल संगम तथा अन्य मजदूर संगठनों ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका प्रस्तुत की थी। इस याचिका में घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना के दायरे में लाने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि घरेलू कामगार असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और उन्हें उचित वेतन तथा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता।

CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सुनवाई के आरंभ में ही CJI ने संकेत दिया कि वे इस मामले को आगे बढ़ाने में संकोच कर रहे हैं क्योंकि इससे प्रत्येक परिवार में कानूनी विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

‘झंडा यूनियनों’ पर क्यों भड़के CJI?

जब याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने सामूहिक सौदेबाजी की वैधता और यूनियनों की आवश्यकता पर जोर दिया, तो CJI सूर्यकांत ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, “देश में कितनी औद्योगिक इकाइयां इन यूनियनों के कारण बंद हुई हैं, इसकी वास्तविकता को समझिए। समस्त पारंपरिक उद्योग इन ‘झंडा यूनियनों’ की वजह से पूरे देश में ठप हो चुके हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि यूनियन के पदाधिकारी काम नहीं करना चाहते और ये ट्रेड यूनियनों के नेता औद्योगिक विकास को अवरुद्ध करने के सर्वाधिक जिम्मेदार हैं। CJI ने स्वीकार किया कि शोषण होता है, परंतु उन्होंने कहा कि शोषण को रोकने के लिए वैकल्पिक उपाय अपनाए जाने चाहिए।

एजेंसियों को असली शोषक बताया

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने महानगरों में घरेलू कामगारों की सेवाएं प्रदान करने वाली एजेंसियों को वास्तविक शोषक करार दिया। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने एक एजेंसी को प्रति कामगार 40,000 रुपये का भुगतान किया, लेकिन कामगार को केवल 19,000 रुपये ही मिले। शेष राशि एजेंसी ने रख ली।

उन्होंने यह भी कहा कि ट्रेड यूनियनों के नेता मजदूरों को बीच में छोड़कर चले जाते हैं और उनका वास्तविक हित नहीं देखते।

न्यूनतम मजदूरी तय करने पर चिंता

CJI ने न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के संभावित नकारात्मक परिणामों की ओर भी इशारा किया। उनका मानना था कि यदि घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय कर दिया गया, तो लोग कामगार रखना बंद कर देंगे। इससे बेरोजगारी में वृद्धि होगी और मजदूरों की स्थिति और खराब हो जाएगी।

न्यायमूर्ति ने कहा, “न्यूनतम मजदूरी तय करने की जल्दबाजी में हम अनजाने में शोषण को और बढ़ावा दे सकते हैं। यह मांग और आपूर्ति का प्रश्न है। यदि न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की गई तो लोग कामगार नहीं रखेंगे और समस्याएं और बढ़ेंगी।”

न्यायालय का अंतिम निर्णय

CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति बागची की खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह केंद्र अथवा राज्य सरकारों को कानून बनाने का निर्देश नहीं दे सकती, क्योंकि यह विधायी विषय है।

हालांकि, न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं को सुझाव दिया कि वे राज्यों और केंद्र सरकार को घरेलू कामगारों की समस्याओं से अवगत कराते रहें। अदालत ने आशा व्यक्त की कि राज्य और केंद्र सरकारें इस मुद्दे का कोई उपयुक्त समाधान निकालेंगी।

पूर्व में CJI की टिप्पणी

यह याचिका कई राज्यों के घरेलू कामगारों की यूनियनों ने संयुक्त रूप से दायर की थी। याचिकाकर्ताओं ने 2025 में CJI सूर्यकांत के एक निर्णय का हवाला दिया था, जिसमें उन्होंने घरेलू कामगारों के लिए विशेष कानून बनाने की आवश्यकता पर बल दिया था।

लेकिन केंद्र सरकार ने इसे राज्यों का विषय बताया और राज्य सरकारों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

विवाद और प्रतिक्रिया

CJI की ये ताजा टिप्पणियां ट्रेड यूनियनों की भूमिका और घरेलू कामगारों के अधिकारों पर व्यापक बहस को जन्म दे सकती हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे मजदूरों के दीर्घकालिक हित में देख रहे हैं, जबकि अनेक श्रमिक संगठन इसे यूनियनों पर प्रत्यक्ष हमला मान रहे हैं।

श्रमिक संगठनों का तर्क है कि ट्रेड यूनियनों ने ऐतिहासिक रूप से मजदूरों के अधिकारों की रक्षा की है और उनके बिना श्रमिकों का शोषण और बढ़ सकता है। वहीं, उद्योग जगत का मानना है कि कठोर श्रम कानून और आक्रामक यूनियनें व्यवसाय को प्रभावित करती हैं।

यह मामला श्रम अधिकारों, औद्योगिक विकास और न्यायिक दृष्टिकोण के बीच संतुलन का प्रश्न उठाता है।

 

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