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मिम्बर-ओ-मेहराब की सियासी तिजारत और कारी शफीक कासमी का किरदार, पश्चिम बंगाल की ऐतिहासिक मस्जिद नाखुदा के नायब इमाम की सियासी गुंडागर्दी, बर्खास्तगी की मांग

कोलकाता की ऐतिहासिक मस्जिद नाखुदा के नायब इमाम कारी शफीक कासमी पर टीएमसी (TMC) के इशारे पर मस्जिद का राजनीतिक इस्तेमाल करने और मुस्लिम समाज को सिर्फ वोट बैंक बनाए रखने का गंभीर आरोप। जनता ने की तुरंत बर्खास्तगी की मांग।

Qalam Times News Network
कोलकाता |19 मई 2026

तृणमूल सरकार की नीतियां और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की शुरुआत

बंगाल की राजनीति में 2011 के बाद एक ऐसा भयानक और जहरीला दौर शुरू हुआ जिसे शुरुआत में धर्मनिरपेक्षता (secularism), अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और सांप्रदायिक सौहार्द के आकर्षक नारों की आड़ में पेश किया गया था। लेकिन समय बीतने के साथ-साथ सामाजिक और राजनीतिक हलकों ने यह कड़वा सवाल उठाना शुरू कर दिया कि आखिर वे कौन सी नीतियां थीं जिन्होंने बंगाल के शांतिपूर्ण समाज में हिंदू और मुसलमान के बीच नफरत की खाई को इस हद तक गहरा और अटूट बना दिया। आलोचकों का यह साफ और स्पष्ट रुख है कि ममता बनर्जी की सरकार ने तात्कालिक राजनीतिक लाभ और सत्ता की हवस के लिए धर्म और राजनीति का ऐसा खतरनाक कॉकटेल तैयार किया, जिसके जहरीले और विनाशकारी परिणाम बाद में पूरे समाज ने भुगते।

इमामों का मानदेय: तुष्टिकरण की राजनीति और भाजपा का उभार

इस सिलसिले में विशेष रूप से इमामों के वेतन (Imam Allowance) का मुद्दा एक ऐसा गंभीर कदम था जिसने बंगाल की राजनीति को एक नई और चिंताजनक दिशा दे दी। एक धर्मनिरपेक्ष देश में किसी भी सरकार द्वारा किसी विशिष्ट धार्मिक वर्ग को सरकारी खजाने से वेतन या वजीफा देना एक अत्यंत खतरनाक, असंवैधानिक और घटिया链 राजनीतिक खेल था। इससे मुसलमानों को कोई बड़ा आर्थिक, शैक्षणिक या सामाजिक विकास हासिल नहीं हुआ, बल्कि महज कुछ लोगों को कुछ महीनों तक कुछ रकम मिली और कई हकदारों को तो इसका पूरा लाभ भी नहीं मिल सका। मगर इस बचकाने कदम से पूरे देश में यह नकारात्मक संदेश चला गया कि ममता बनर्जी सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों के तुष्टिकरण (appeasement) की राजनीति कर रही हैं।

मस्जिद

यही वह बिंदु था जिसे भाजपा (BJP) ने बाद में अपने राजनीतिक उभार के लिए एक शक्तिशाली हथियार बनाया और बार-बार यह सवाल उठाकर हिंदू समाज को आक्रोशित किया कि “यदि इमामों को सरकारी खजाने से वेतन मिल सकता है, तो मंदिरों के पुजारियों को क्यों नहीं?” आलोचकों के अनुसार, यही वह अंधकारमय क्षण था जहां बंगाल की धरती पर धार्मिक ध्रुवीकरण (religious polarization) और सांप्रदायिकता का बीज मजबूत हुआ और हिंदू समाज में तीव्र नाराजगी पैदा हुई, जिसे बाद में भाजपा ने राजनीतिक ताकत और सीटों में बदल दिया।

मस्जिद नाखुदा का राजनीतिकरण और नायब इमाम पर गंभीर आरोप

मस्जिद

इसी जहरीले और साजिशी माहौल में कोलकाता की ऐतिहासिक मस्जिद नाखुदा और उसके नायब इमाम कारी शफीक कासमी का किरदार भी भीषण आलोचना और जन-आक्रोश के घेरे में आ गया। ऐसा इसलिए क्योंकि मस्जिद नाखुदा सिर्फ कोलकाता की एक मस्जिद नहीं है, बल्कि उपमहाद्वीप (subcontinent) के मुसलमानों की एक ऐतिहासिक, प्रतीकात्मक और गौरवशाली पहचान मानी जाती है, जिसके मिम्बर (मंच) से निकलने वाली आवाज पूरे देश के मुसलमानों पर गहरा प्रभाव रखती है। इसलिए, जब इस पवित्र मिम्बर पर राजनीति का गंदा और घिनौना साया नजर आने लगा, तो समुदाय के भीतर से सवाल भी उग्र हो गए।

आलोचकों ने यह गंभीर आरोप लगाया कि मस्जिद की पवित्रता का तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राजनीतिक हितों के लिए बेरहमी से इस्तेमाल किया गया। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को मस्जिद के प्लेटफॉर्म पर खुलेआम जगह दी गई, चुनावी माहौल में राजनीतिक समर्थन को धार्मिक प्रभाव से जोड़ा गया और अल्लाह के घर के मिम्बर-ओ-मेहराब को तृणमूल कांग्रेस के प्रचार का सस्ता जरिया बना दिया गया। ऐसे में जब मस्जिद के अंदर से पार्टियां चलने लगें और वह राजनीतिक जोड़-तोड़ का केंद्र बन जाए, तो फिर कौम (समाज) को तबाही और बर्बादी से कौन बचा सकता है? स्थिति ऐसी हो गई कि शफीक कासमी ने इस धार्मिक संस्थान को धीरे-धीरे राजनीतिक ताकत और दलालों का केंद्र बना दिया।

धार्मिक मंचों से चुनावी प्रचार और नैतिक मूल्यों की पाशवी पामली

इस गंभीर राजनीतिक व्यापार के दौरान, कारी शफीक कासमी ने सभी नैतिक और धार्मिक सीमाओं को लांघते हुए फिल्मी अभिनेत्रियों और विवादित राजनीतिक चेहरों के साथ चुनावी अभियानों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। विशेष रूप से नुसरत जहां जैसी शख्सियतों का नाम लेकर जनता ने यह तीखा सवाल खड़ा किया कि क्या एक इमाम का पद और कार्य राजनीतिक उम्मीदवारों के लिए गली-गली वोट मांगना और मंच सजाना है?

आलोचकों का कहना है कि जब कोई आलिम (धार्मिक विद्वान) या इमाम किसी विशिष्ट राजनीतिक दल का चेहरा और एजेंट बन जाता है, तो वह पूरे समाज का प्रतिनिधित्व और अपना नैतिक सम्मान खो देता है। इसके बाद उसकी हर बात धार्मिक मार्गदर्शन के बजाय शुद्ध राजनीति और व्यक्तिगत स्वार्थ पर आधारित मानी जाने लगती है। यही कारण है कि बंगाल के एक बहुत बड़े और गंभीर वर्ग में यह तीव्र अहसास पैदा हुआ कि उनका धार्मिक नेतृत्व जन-समस्याओं, गरीबी और लाचारी को हल करने के बजाय राजनीतिक निकटता, सत्ता के गलियारों के चक्कर काटने और व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने में अधिक रुचि रखता है।

NRC और CAA आंदोलन: मुस्लिम भावनाओं का राजनीतिक दोहन

यह पाखंड और शोषण यहीं नहीं रुका, बल्कि एनआरसी (NRC) और सीएए (CAA) आंदोलन के दौरान भी मस्जिद नाखुदा का नाम बार-बार शर्मनाक तरीके से चर्चा में आया। सार्वजनिक बयानों में यह आरोप खुलकर सामने आए कि आम मुसलमानों की सच्ची और निष्कपट भावनाओं का तृणमूल कांग्रेस के राजनीतिक लाभ के लिए बेरहमी से इस्तेमाल किया गया। मस्जिद को विरोध प्रदर्शन की राजनीति का केंद्र बनाकर पेश किया गया और एक संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दे को विशिष्ट राजनीतिक हलकों के फायदे से जोड़ दिया गया।

इस पर यह जायज सवाल उठाया गया कि यदि एनआरसी पूरे देश के मुसलमानों के अस्तित्व और नागरिकता का मुद्दा था, तो इस विरोध प्रदर्शन को एक विशिष्ट मस्जिद और कुछ विशिष्ट接口 राजनीतिक चेहरों के इर्द-गिर्द ही क्यों सीमित रखा गया? आलोचकों के अनुसार, इस पूरे भयानक माहौल में आम मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं और नागरिकता छिन जाने के डर को ढाल बनाया गया, जबकि इसका असली राजनीतिक लाभ तृणमूल के नेताओं ने उठाया। यहां तक देखा गया कि कुछ लोग इन आंदोलनों के माध्यम से अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने, अपने चमचों को आगे बढ़ाने और स्थानीय राजनीति में अपने व्यावसायिक व व्यक्तिगत हितों को साधने की दुर्भावनापूर्ण कोशिशें कर रहे थे।

“१५ साल तक साबुन की तरह इस्तेमाल”: केवल वोट बैंक बना मुस्लिम समाज

वास्तविकता यह है कि पंद्रह वर्षों तक बंगाल के मुसलमानों को सिर्फ और सिर्फ एक साबुन की तरह इस्तेमाल किया गया। यानी मुसलमानों को जितना इस्तेमाल किया गया, वे शैक्षणिक और आर्थिक रूप से उतने ही घिसते और मिटते चले गए। इस तीखे सच ने बंगाल के करोड़ों मुसलमानों में बेचैनी, निराशा और गुस्से को हवा दी है। मुसलमान आज यह महसूस करते हैं कि उनके वोट तो नियमित रूप से लिए गए, उनकी धार्मिक भावनाओं और भाजपा के डर का फायदा तो उठाया गया, लेकिन जब बात शिक्षा, रोजगार, व्यापार, स्वास्थ्य और वास्तविक सामाजिक विकास की आई, तो उन्हें अंधेरे में धकेल दिया गया।

मुसलमानों को विकास के नाम पर सिर्फ एक पिछड़ा हुआ वोट बैंक बनाकर रखा गया, उन्हें भावनात्मक और खोखले नारों में उलझाया गया और उनके वास्तविक व बुनियादी मुद्दों को हमेशा के लिए पृष्ठभूमि में डाल दिया गया। यही कारण है कि आज भी बंगाल के कई मुस्लिम बहुल इलाकों में मुसलमान शैक्षणिक पिछड़ेपन, बेरोजगारी, मुफलिसी और आर्थिक कमजोरी के दलदल में धंसे हुए हैं, लेकिन राजनीतिक रैलियों में उन्हें सिर्फ धार्मिक डर दिखाकर और भावनात्मक ब्लैकमेलिंग के जरिए तृणमूल के पक्ष में लामबंद किया जाता रहा।

धार्मिक नेतृत्व का पतन: सत्ता की निकटता और जनता से दूरी

मस्जिद

यह पूरा विवाद, गुस्सा और जन-जागृति आखिरकार एक बुनियादी और सैद्धांतिक सवाल पर आकर रुक जाती है कि क्या किसी इमाम या धार्मिक नेता को राजनीतिक दलों का प्रवक्ता और दलाल बनना चाहिए? क्योंकि जागरूक लोग भली-भांति जानते हैं कि जब उलेमा (धार्मिक गुरु) सत्ता के बहुत करीब हो जाते हैं, तो वे गरीब जनता और समाज की वास्तविक समस्याओं से कोसों दूर हो जाते हैं। फिर उनकी प्राथमिकता धर्म की सर्वोच्चता और समाज का कल्याण नहीं, बल्कि राजनीतिक संबंध, व्यावसायिक लाभ और व्यक्तिगत ऐशो-आराम बन जाते हैं।

इसीलिए अब पूरे बंगाल से एक अत्यंत मजबूत, आक्रामक और क्रांतिकारी आवाज उठ रही है कि मस्जिदों को राजनीति के गंदे अखाड़े से तुरंत अलग रखा जाए, इस स्वघोषित धार्मिक नेतृत्व का कड़ा हिसाब लिया जाए और मुसलमानों को सिर्फ भावनात्मक नारों के चक्रव्यूह से निकालकर शिक्षा, अर्थव्यवस्था, स्वतंत्र नेतृत्व और वास्तविक सामाजिक प्रगति की ओर ले जाया जाए। क्योंकि जब मस्जिद राजनीति का अड्डा और दासी बन जाए, तो न केवल धर्म की विश्वसनीयता मिट्टी में मिल जाती है, बल्कि पूरे समाज का भरोसा भी हमेशा के लिए टूट जाता है।

स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व को दबाने और दलीय गुलामी थोपने की साजिश

मस्जिद नाखुदा कोलकाता के नायब इमाम कारी शफीक कासमी ने मस्जिद जैसे पवित्र और निष्पक्ष संस्थान को धीरे-धीरे तृणमूल कांग्रेस के एक नियमित राजनीतिक केंद्र और मुख्यालय में बदल दिया। उन पर यह गंभीर आरोप है कि उन्होंने मुसलमानों को एक विशिष्ट राजनीतिक दल और उसके नेतृत्व का अंधा और बहरा समर्थक बनाने का अथक प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप बंगाल के भीतर स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व कमजोर से कमजोर होता चला गया। जनता का साफ कहना है कि कारी शफीक कासमी ने बंगाल में किसी भी स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व को उभरने से रोकने और मुसलमानों को सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के पैरों की जूती और बंधुआ वोट बैंक तक सीमित रखने में आपराधिक भूमिका निभाई।

उन्होंने मस्जिद के मंच का राजनीतिक उद्देश्यों के लिए उपयोग करते हुए टीएमसी (TMC) के नेताओं को मस्जिद में आमंत्रित किया, उनकी शान में कसीदे पढ़े और उनके समर्थन में नियमित भाषण और सभाएं आयोजित करवाईं, जो कि मस्जिद की पवित्रता, उसकी निष्पक्ष धार्मिक स्थिति और गरिमा के सर्वथा विरुद्ध और एक घिनौना कृत्य था। इसके अलावा उन पर यह तीव्र आपत्ति भी है कि उन्होंने चुनावी अभियानों में ऐसी विवादित शख्सियतों और फिल्मी अभिनेत्रियों के साथ मंच साझा किया, जिनकी जीवनशैली और विचारों को धार्मिक हलके इस्लामी मूल्यों और नैतिकता के खिलाफ मानते हैं, जिससे समाज के एक बहुत बड़े और स्वाभिमानी वर्ग में भारी नाराजगी और नफरत पैदा हुई।

मजहब की आड़ में राजनीतिक व्यापार और कौम के साथ विश्वासघात

आलोचकों के अनुसार, कारी शफीक कासमी ने एक पवित्र धार्मिक केंद्र को धीरे-धीरे राजनीतिक अड्डे में बदलकर मिम्बर-ओ-मेहराब से समाज का वास्तविक मार्गदर्शन करने के बजाय तृणमूल कांग्रेस की चाकरी और समर्थन का माहौल बनाया। उन्होंने मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं और धार्मिक विश्वास का सौदा करते हुए तृणमूल कांग्रेस की सरकार को मजबूत करने में मुख्य भूमिका निभाई और बंगाल के मुसलमानों को स्वतंत्र राजनीतिक सोच और समझ देने के बजाय व्यक्ति-पूजा, नारेबाजी और दलीय वफादारी की खाई में धकेल दिया। उन्होंने बंगाल में स्वतंत्र मुस्लिम नेतृत्व को उभरने नहीं दिया और हर उस निष्पक्ष आवाज को कमजोर करने की साजिश की जो मुसलमानों के स्वतंत्र और गरिमापूर्ण प्रतिनिधित्व की बात करती थी। हालांकि मस्जिद जैसे पवित्र स्थान को राजनीतिक रैलियों, party समर्थन और चुनावी गतिविधियों के लिए उपयोग करना कोई धार्मिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी तरह से धर्म का राजनीतिक व्यापार और दलाली है।

यह आरोप भी बार-बार सामने आया कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं को मस्जिद के मंच पर जगह दी जाती रही, उनके समर्थन में बाकायदा जत्थे और सभाएं आयोजित की गईं और धार्मिक प्रभाव का राजनीतिक व वित्तीय लाभ के लिए इस्तेमाल किया गया, जो कि मस्जिद की पवित्रता, निष्पक्षता और धार्मिक गरिमा के खिलाफ एक खुला अपराध था। चुनावी अभियानों में फिल्मी हस्तियों और विवादित चेहरों के साथ मंच साझा करने पर विरोधियों ने इसे धार्मिक पद की गरिमा के प्रतिकूल करार देकर कड़ा विरोध किया। बंगाल के स्वाभिमानी मुसलमानों का कहना है कि पंद्रह वर्षों तक उनकी भावनाओं, भाजपा के डर और धार्मिक जुड़ाव को सिर्फ और सिर्फ तृणमूल के राजनीतिक लाभ के लिए निचोड़ा गया, जबकि शिक्षा, रोजगार, अर्थव्यवस्था और वास्तविक मुस्लिम नेतृत्व के मुद्दों को कचरे के ढेर में डाल दिया गया।

अंतिम जनादेश: मस्जिदों की मुक्ति और कारी शफीक कासमी की तुरंत बर्खास्तगी

यही कारण है कि आज बंगाल की गली-गली से एक मजबूत और निर्णायक आवाज उठ रही है कि मस्जिदों को राजनीतिक दलों के प्रभाव और कब्जे से तुरंत मुक्त कराया जाए, इस स्वार्थी धार्मिक नेतृत्व को जनता की अदालत में खड़ा किया जाए और मस्जिद नाखुदा की पवित्रता, गरिमा और मुसलमानों के विश्वास को बहाल करने के लिए नायब इमाम कारी शफीक कासमी को उनके पद से तुरंत बर्खास्त और बेदखल किया जाए, ताकि धर्म और समाज को और अधिक तबाही से बचाया जा सके।

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