गौ राजनीति को लेकर बढ़ते विवाद के बीच मानवाधिकार कार्यकर्ता शमीम अहमद ने मुसलमानों से आत्ममंथन, सामाजिक संवेदनशीलता और कानून के सम्मान की अपील की।
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता | 24 मई 2026
मानवाधिकार कार्यकर्ता शमीम अहमद बोले — भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और सामाजिक गैर-जिम्मेदारी ने हालात को और गंभीर बनाया
गौ राजनीति को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। मॉब लिंचिंग, धार्मिक भावनाओं और कानून के सख्त पालन को लेकर माहौल लगातार संवेदनशील होता जा रहा है। हाल ही में कुछ धार्मिक हस्तियों द्वारा गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने और गोहत्या व बीफ एक्सपोर्ट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग के बाद विभिन्न वर्गों में चर्चा और विवाद बढ़ गया है। इसी बीच ही्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन के अध्यक्ष, प्रसिद्ध सामाजिक एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता और क़ाइद-ए-उर्दू Shamim Ahmed ने बेहद बेबाक अंदाज़ में अपनी राय रखते हुए कहा कि असली समस्या केवल सरकार या कानून नहीं है, बल्कि समाज की अपनी लापरवाही, भावनात्मक सोच और तात्कालिक स्वार्थ भी हैं, जिन्होंने हालात को इस मुकाम तक पहुंचाया है।
शमीम अहमद ने कहा कि सरकार ने यह कानून आज नहीं बनाया, बल्कि ये वर्षों से मौजूद हैं। यदि आज प्रशासन इन्हें सख्ती से लागू कर रहा है तो अचानक इतना शोर क्यों मच रहा है? और जब कानून लागू नहीं होते थे तब भी यही लोग खामोश रहते थे। उन्होंने कहा कि असली सवाल कानून से अधिक हमारे सामाजिक व्यवहार और मानसिकता का है। उनके अनुसार कुछ लोग हर मुद्दे पर खुद को सबसे बड़ा सेक्युलर साबित करने की होड़ में अपनी ही कौम के खिलाफ सफाई देने लगते हैं। उन्होंने कहा कि यह स्थिति बिल्कुल “बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना” जैसी बन गई है, जहां जरूरत से ज्यादा भावुक प्रतिक्रिया देकर अपनी कमजोरियों को दुनिया के सामने पेश किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि गौ राजनीति का मुद्दा इसलिए और गंभीर बनता जा रहा है क्योंकि लोग समझदारी से ज्यादा भावनाओं में प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
“यह समझदारी पहले क्यों नहीं आई?”

शमीम अहमद ने तीखे शब्दों में कहा कि आज कुछ मौलाना और इमाम यह घोषणा कर रहे हैं कि सड़क पर नमाज़ पढ़ने से बचने के लिए जुमे की नमाज़ दो जमाअतों में अदा की जाएगी। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर यह समझदारी पहले क्यों नहीं दिखाई गई? जब हर दस कदम पर छोटी-बड़ी मस्जिदें मौजूद हैं, तो फिर सड़कों को इबादतगाह बनाकर दूसरों को आपत्ति का मौका क्यों दिया गया? यदि आज दो जमाअतें हो सकती हैं तो पहले क्यों नहीं हो सकती थीं? उन्होंने कहा कि बदलते राजनीतिक हालात ने अब लोगों को वास्तविकता का एहसास कराया है।
उन्होंने आगे कहा कि कई इमामों और धार्मिक नेताओं ने कभी अपने खुत्बों में यह नहीं कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर गोमांस को खुले तौर पर लटकाकर बेचना या गलियों-बाजारों में ऐसे दृश्य पैदा करना समझदारी नहीं है, जिससे दूसरे समुदाय की भावनाएं भड़क सकती हैं। उन्होंने कहा कि इस्लाम हमेशा सफाई, अनुशासन, हिकमत और दूसरों की भावनाओं के सम्मान की शिक्षा देता है, लेकिन इन बुनियादी बातों पर गंभीरता से अमल नहीं किया गया। अब जब माहौल सख्त हो चुका है और राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं, तब अचानक सुधार की बातें याद आने लगी हैं।
“सिर्फ बयान देने वाले नेता समाज के साथ खड़े नहीं होते”
शमीम अहमद ने कहा कि दुनिया यही समझती है कि टीवी चैनलों और मीडिया में बयान देने वाले मौलाना पूरी मुस्लिम कौम का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि हकीकत इससे अलग है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे कई लोग न तो दंगों या संकट के समय जनता के बीच दिखाई देते हैं और न ही कानूनी मदद करते हैं, लेकिन मीडिया की सुर्खियों में आने और भावनात्मक माहौल बनाने में सबसे आगे रहते हैं। उन्होंने सवाल किया कि यदि आज कुछ चीजों को गलत, नुकसानदेह या हालात बिगाड़ने वाला माना जा रहा है, तो पहले उनके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाई गई? युवाओं को भावनात्मक नारों के हवाले क्यों छोड़ दिया गया?
अपनी स्पष्टवादिता और जमीनी समझ के लिए पहचाने जाने वाले शमीम अहमद ने हमेशा लोकप्रियता या खुशामद की राजनीति के बजाय सच्चाई, सामाजिक जिम्मेदारी और समाज की वास्तविक भलाई को प्राथमिकता दी है। यही वजह है कि सामाजिक और बौद्धिक हलकों में उनकी बातों को गंभीरता से सुना जाता है, क्योंकि वे केवल आलोचना नहीं करते बल्कि समाज को आत्ममंथन का आईना भी दिखाते हैं।
आत्मनिरीक्षण और सामाजिक समझदारी की जरूरत
अपने बयान के अंत में शमीम अहमद ने कहा कि मुसलमानों को सबसे पहले आत्मनिरीक्षण की जरूरत है। हर समस्या के लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने से पहले खुद के व्यवहार को देखना होगा। उन्होंने कहा कि बदलते हालात के साथ रणनीति और सामाजिक व्यवहार में बदलाव भी जरूरी है। केवल नारे, प्रदर्शन और भावनात्मक भाषण किसी समाज का भविष्य सुरक्षित नहीं कर सकते।
उन्होंने कहा कि हर दंगे, विवाद और राजनीतिक संघर्ष में सबसे ज्यादा नुकसान आम मुसलमान को उठाना पड़ता है, जबकि भड़काऊ बयान देने वाले लोग सुरक्षित कमरों में बैठे रहते हैं। उन्होंने अपील की कि मुसलमान कानून का सम्मान करें, सामाजिक संवेदनशीलता को समझें और ऐसे सभी कार्यों से बचें जो नफरत या तनाव को बढ़ावा देते हों। उन्होंने चेतावनी दी कि उकसाने वाले बयान देने वाले लोग कल जनता को अकेला छोड़ देंगे। इसलिए समुदाय को भावनाओं के बजाय समझदारी, हिकमत और जमीनी सच्चाई के साथ आगे बढ़ना होगा, वरना हालात और गंभीर हो सकते हैं।







