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हिंदी अस्मिता पर केंद्रित खिदिरपुर कॉलेज, कोलकाता में आयोजित 2 दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में अज्ञेय और विद्यानिवास मिश्र के साहित्यिक योगदान, समकालीन हिंदी चिंतन और अस्मिता-बोध पर विद्वानों का गहन विमर्श।

हिंदी अस्मिता पर केंद्रित खिदिरपुर कॉलेज, कोलकाता में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में अज्ञेय और विद्यानिवास मिश्र के साहित्यिक योगदान, समकालीन हिंदी चिंतन और अस्मिता-बोध पर विद्वानों का गहन विमर्श।

संवाददाता, क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता | 24 जनवरी 2026

हिंदी अस्मिता : अज्ञेय और विद्यानिवास मिश्र के संदर्भ में आधुनिक हिंदी चिंतन पर गहन मंथन

हिंदी अस्मिता के वैचारिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक पक्षों पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कोलकाता स्थित खिदिरपुर कॉलेज के हिंदी विभाग द्वारा किया गया। केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के सहयोग से आयोजित इस दो दिवसीय संगोष्ठी का विषय हिंदी अस्मिता बोध: अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय)और विद्यानिवास मिश्र का संदर्भ” था । 19 एवं 20 जनवरी 2026 को लीला राय सभागार में सम्पन्न इस अकादमिक आयोजन का उद्देश्य आधुनिक हिंदी चिंतन में अस्मिता-बोध के स्वरूप को गहराई से समझना था।

संगोष्ठी का उद्घाटन बाबासाहेब आंबेडकर एजुकेशन यूनिवर्सिटी की कुलपति डॉ. सोमा बंद्योपाध्याय ने किया। अपने उद्घाटन वक्तव्य में उन्होंने कहा कि हिंदी अस्मिता की मूल शक्ति उसके समावेशी चरित्र में निहित है। उनके अनुसार अज्ञेय और विद्यानिवास मिश्र ने हिंदी को केवल साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि व्यापक सांस्कृतिक चेतना के रूप में देखा और अपनी रचनात्मकता एवं संगठनशीलता के माध्यम से हिंदी की पहचान को सुदृढ़ किया। इस अवसर पर खिदिरपुर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अभिजीत गांगुली ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के दौरान “अस्मिता” शीर्षक से प्रकाशित स्मारिका का भी लोकार्पण किया गया।

बीज वक्तव्य में भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के निदेशक डॉ. शंभुनाथ ने समकालीन साहित्यिक विमर्श की वैचारिक दिशाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हिंदी अस्मिता केवल भाषायी पहचान तक सीमित नहीं रही, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना का सशक्त माध्यम बन चुकी है।

संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में देश के अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों ने सहभागिता की। प्रमुख वक्ताओं में उमेशचंद्र कॉलेज, कोलकाता के सहायक प्राध्यापक डॉ. कमल कुमार, रेल मंत्रालय, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक डॉ. वरुण कुमार, गोखले मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज की डॉ. रेश्मी पांडा मुखर्जी तथा राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान, कोलकाता के राजभाषा सलाहकार श्री अजेन्द्रनाथ त्रिवेदी शामिल रहे। सत्रों की अध्यक्षता वेस्ट बंगाल स्टेट यूनिवर्सिटी, बारासात के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण होता और कोलकाता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. रामप्रवेश रजक ने की।

पत्र-वाचन सत्रों में डॉ. विदुषी आमेटा, सुश्री महज़बीन खानम, सुश्री नाज़िया रज़ा, डॉ. स्नेहा सिंह, डॉ. श्रीपर्णा तरफदार, डॉ. गुलनाज़ बेगम, डॉ. सादिया परवीन, सुश्री सुधा, डॉ. परमजीत कुमार पंडित, सुश्री पार्वती साह, सुश्री अर्चना सिंह, श्री विवेक तिवारी सहित अनेक शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इन शोध-पत्रों में अज्ञेय और विद्यानिवास मिश्र के साहित्य को अस्मिता-बोध के विविध संदर्भों में विश्लेषित किया गया।

इस संपूर्ण अकादमिक आयोजन की सफलता के केंद्र में खिदिरपुर कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. महमुदा खानम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। वे इन दिनों विभागीय दायित्वों का निर्वहन अत्यंत गरिमा, विवेक और संतुलन के साथ कर रही हैं। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की उल्लेखनीय सफलता का श्रेय उनके कुशल नेतृत्व, सुदृढ़ संयोजन और प्रभावी आयोजन क्षमता को जाता है।

डॉ. महमुदा खानम न केवल एक समर्पित शिक्षिका हैं, बल्कि उनमें उत्कृष्ट संगठनात्मक दक्षता भी निहित है। उनके प्रशासनिक अनुशासन, अकादमिक दृष्टि और कार्यकुशलता की सराहना महाविद्यालय स्तर पर निरंतर की जाती रही है। यही कारण है कि कॉलेज प्रशासन द्वारा सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ प्रायः उन्हें सौंपी जाती हैं, जिन्हें वे अपनी योजनाबद्ध कार्यशैली और अथक परिश्रम से सफलतापूर्वक सम्पन्न करती हैं।

संगोष्ठी की सफलता में हिंदी विभाग के प्राध्यापकों—डॉ. इतु सिंह, डॉ. अर्चना पांडेय, डॉ. रमा मिश्र और डॉ. सुधा गौड़—का भी सक्रिय सहयोग रहा। समग्र रूप से यह आयोजन हिंदी अस्मिता और आधुनिक हिंदी साहित्य के गंभीर अध्ययन के लिए एक सशक्त और सार्थक मंच सिद्ध हुआ।

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