रबीन्द्र जयंती के अवसर पर कोलकाता में आयोजित विशेष संगोष्ठी में शमीम अहमद ने गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को हिंदू-मुस्लिम एकता, मानवता और सामाजिक सौहार्द का सबसे बड़ा प्रतीक बताया।
Qalam Times News Network
कोलकाता | 9 मई 2026

रबीन्द्र जयंती के अवसर पर कोलकाता स्थित ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन के राष्ट्रीय कार्यालय में एक गरिमामयी एवं वैचारिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विश्वकवि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के साहित्य, मानवतावादी चिंतन, सांस्कृतिक योगदान और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए किए गए ऐतिहासिक प्रयासों पर विस्तार से चर्चा हुई।
इस अवसर पर ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष शमीम अहमद ने कहा कि रबीन्द्र जयंती केवल एक साहित्यकार की जन्मतिथि नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों को याद करने का अवसर है। उन्होंने कहा कि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने लेखन और सामाजिक विचारों के माध्यम से प्रेम, समानता और भाईचारे की ऐसी मिसाल पेश की, जो आज भी प्रासंगिक बनी हुई है।
अपने संबोधन में शमीम अहमद ने टैगोर की अमर कृति “गीतांजलि” का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पुस्तक ने भारतीय साहित्य को वैश्विक पहचान दिलाई। टैगोर को मिला नोबेल पुरस्कार केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं था, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का अंतरराष्ट्रीय सम्मान था।

रबीन्द्र जयंती कार्यक्रम के दौरान उन्होंने वर्ष 1905 के बंग-भंग आंदोलन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब ब्रिटिश शासन ने बंगाल को धार्मिक आधार पर विभाजित करने की योजना बनाई, तब गुरुदेव टैगोर ने समाज को जोड़ने के लिए “रक्षा बंधन” को एकता के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समुदायों के लोगों से एक-दूसरे को राखी बांधने का आह्वान किया, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि बंगाल की संस्कृति और समाज को धर्म के आधार पर बांटा नहीं जा सकता।
शमीम अहमद ने कहा कि आज जब देश में सामाजिक और धार्मिक ध्रुवीकरण की घटनाएं सामने आ रही हैं, तब रबीन्द्र जयंती हमें टैगोर के उन विचारों की याद दिलाती है जो इंसानियत, सहिष्णुता और सामाजिक सद्भाव पर आधारित थे। उन्होंने कहा कि टैगोर का साहित्य केवल कविता और कहानियों तक सीमित नहीं था, बल्कि वह समाज सुधार और राष्ट्रीय चेतना का सशक्त माध्यम भी था।
उन्होंने शिक्षा, ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में टैगोर के योगदान को भी ऐतिहासिक बताया। शांतिनिकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय को उन्होंने टैगोर की दूरदर्शी शिक्षा नीति का जीवंत उदाहरण कहा।

कार्यक्रम में मौजूद सदस्यों ने गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके आदर्शों को वर्तमान समय में अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। संस्था की ओर से यह संकल्प भी लिया गया कि मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए टैगोर के विचारों को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाया जाएगा।
अंत में शमीम अहमद ने कहा कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता, सांस्कृतिक विरासत और आपसी भाईचारे में निहित है, और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का जीवन इसी विचारधारा का सबसे प्रेरणादायक उदाहरण है।






