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Homeभारतीय मुसलमाननफरती भाषण: लोकतंत्र की आत्मा पर गहराता संकट

नफरती भाषण: लोकतंत्र की आत्मा पर गहराता संकट

नफरती भाषण पर India Hate Lab की रिपोर्ट ने भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, लोकतंत्र और राज्य की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

Qalam Times News Network
नई दिल्ली | 21 जनवरी 2026

नफरती भाषण: अमेरिका की रिपोर्ट ने भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और राज्य की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए

नफरती भाषण

नफरती भाषण अब भारत में एक छिटपुट या चुनावी समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह धीरे-धीरे सामाजिक और राजनीतिक जीवन का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है। अमेरिका स्थित रिसर्च ग्रुप India Hate Lab की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2025 में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरती भाषणों में 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जो लोकतांत्रिक मूल्यों को भीतर से खोखला कर रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में कुल 1318 नफरती भाषण की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें से 98 प्रतिशत मुसलमानों को निशाना बनाती हैं। चिंता की बात यह है कि लगभग एक चौथाई मामलों में सीधे हिंसा की अपील की गई। यह सिर्फ बोलने की आज़ादी का दुरुपयोग नहीं, बल्कि नफरती भाषण को सामाजिक स्वीकृति मिलने का संकेत भी है। जब नफरत सामान्य हो जाती है, तो हिंसा असामान्य नहीं रहती।

इस रिपोर्ट का एक और अहम पहलू यह है कि 88 प्रतिशत घटनाएं भाजपा शासित राज्यों में दर्ज हुईं। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में आंकड़े सबसे अधिक हैं। सवाल यह नहीं है कि कौन सी पार्टी सत्ता में है, सवाल यह है कि क्या राज्य अपने नागरिकों—खासकर अल्पसंख्यकों—की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहा है या नहीं। जब सत्ता के करीब खड़े लोग या संगठनों से जुड़े नेता ऐसे भाषण देते हैं, तो संदेश साफ जाता है कि जवाबदेही कमजोर पड़ चुकी है।

नफरती भाषण

नफरत की भाषा का स्तर भी डराने वाला है। किसी समुदाय को ‘दीमक’, ‘परजीवी’ या ‘ज़ॉम्बी’ कहना केवल अपमान नहीं, बल्कि इंसानियत से बाहर धकेलने की कोशिश है। इतिहास गवाह है कि जब किसी समूह को अमानवीय बना दिया जाता है, तब उसके खिलाफ हिंसा को जायज़ ठहराना आसान हो जाता है। यही कारण है कि इस तरह की भाषा को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि ‘लव जिहाद’ और ‘लैंड जिहाद’ जैसी साजिश थ्योरी अब मुख्यधारा के भाषणों का हिस्सा बन चुकी हैं। यह नफरत को वैचारिक जामा पहनाने की रणनीति है, ताकि डर और संदेह को स्थायी बनाया जा सके। ईसाइयों के खिलाफ बढ़ती घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि दायरा लगातार फैल रहा है।

भाजपा ने पहले भी ऐसी रिपोर्टों को पक्षपाती बताया है और अपनी कल्याणकारी योजनाओं का हवाला दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास योजनाएं नफरत की राजनीति का विकल्प बन सकती हैं? क्या आर्थिक लाभ सामाजिक सम्मान की कमी को पूरा कर सकते हैं? जवाब साफ है—नहीं।

नफरती भाषण पर चुप्पी, असहमति नहीं बल्कि मौन सहमति मानी जाती है। लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं चलता, वह बराबरी, सुरक्षा और सम्मान से जीवित रहता है। अगर आज नफरत को खुली छूट दी गई, तो कल उसका खामियाज़ा पूरा समाज भुगतेगा।

यह रिपोर्ट चेतावनी है—सरकार के लिए भी, समाज के लिए भी। अब सवाल यह नहीं है कि आंकड़े सही हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम इस सच्चाई का सामना करने को तैयार हैं।

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