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Homeबंगालमतदान विश्लेषण: पश्चिम बंगाल में ‘बंपर’ दावे की सच्चाई क्या है?

मतदान विश्लेषण: पश्चिम बंगाल में ‘बंपर’ दावे की सच्चाई क्या है?

मतदान विश्लेषण से जानिए पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में 93% मतदान के दावे की सच्चाई, असल बढ़ोतरी सिर्फ 2-3% क्यों है।

मतदान आंकड़ों की पड़ताल में सामने आई नई तस्वीर, 2021 के मुकाबले बढ़ोतरी सीमित

मतदान

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता | 26 अप्रैल 2026
मतदान विश्लेषण यह बताता है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में सामने आए “93% बंपर मतदान” के दावों को लेकर जो माहौल बनाया जा रहा है, वह पूरी तरह वास्तविकता को नहीं दर्शाता। चुनाव आयोग के आंकड़ों और उनके तार्किक परीक्षण के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक वृद्धि केवल 2-3 प्रतिशत के आसपास ही है।
चुनाव आयोग द्वारा 23 अप्रैल की रात जारी आंकड़ों के अनुसार पहले चरण में लगभग 91.78% मतदान दर्ज किया गया। इसे “रिकॉर्ड” और “असाधारण” बताकर राजनीतिक विश्लेषण किए जा रहे हैं। लेकिन मतदान विश्लेषण के जरिए जब इन आंकड़ों की गहराई से जांच की जाती है, तो तस्वीर कुछ अलग ही नजर आती है।
2021 के चुनाव:
• कुल मतदाता: 7.34 करोड़
• कुल मतदान: 6.04 करोड़
• मतदान प्रतिशत: लगभग 82%
• कुल सीटें: 294
2026 के चुनाव (पहला चरण):
• कुल वैध मतदाता: 6.83 करोड़
हटाए गए नाम: लगभग 64 लाख
• संदिग्ध सूची से हटाए गए: 27 लाख
• पहले चरण के मतदाता: 3.60 करोड़
• सीटें: 152
• मतदान: 92–93%
चुनाव आयोग ने इस बार बड़ी संख्या में ऐसे नाम हटाए हैं जो या तो मृत थे, स्थानांतरित हो चुके थे या डुप्लिकेट थे। यानी ये वे मतदाता थे जो पहले सूची में मौजूद थे लेकिन वास्तव में मतदान करने की स्थिति में नहीं थे।
अगर यही प्रक्रिया 2021 में भी अपनाई जाती, तो कुल मतदाताओं की संख्या 7.34 करोड़ से घटकर लगभग 6.70 करोड़ रह जाती।
अब इसी आधार पर देखें:
• 6.70 करोड़ में से 6.04 करोड़ ने वोट दिया
• वास्तविक मतदान प्रतिशत होता: लगभग 90%
2026 के पहले चरण में मतदान 92-93% बताया जा रहा है।
अगर 2021 के आंकड़ों को भी इसी तरह शुद्ध किया जाए, तो उस समय भी मतदान करीब 90% के आसपास बैठता है। यानी असल बढ़ोतरी सिर्फ 2-3% की है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
• 2021 का डेटा पूरे 294 सीटों का है
• 2026 का 93% आंकड़ा सिर्फ 152 सीटों का है
• बाकी सीटों में प्रतिशत बदल सकता है
• लेकिन कुल मिलाकर “बंपर उछाल” का दावा तथ्यात्मक रूप से मजबूत नहीं दिखता
इस पूरे मतदान विश्लेषण से यह साफ होता है कि “भारी मतदान” का नैरेटिव आंशिक रूप से भ्रामक हो सकता है। चुनावी आंकड़ों को समझने के लिए सिर्फ प्रतिशत नहीं, बल्कि उनके पीछे का डेटा और प्रक्रिया भी देखना जरूरी है।

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