PERFORMANCE आधारित तृणमूल उम्मीदवार सूची का विश्लेषण, 74 विधायक बाहर, मुस्लिम उम्मीदवारों की अहम भूमिका।
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली | 17 मार्च 2026

PERFORMANCE अब सिर्फ कॉर्पोरेट दुनिया का शब्द नहीं रहा, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी यह निर्णायक मापदंड बनता दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस द्वारा 2026 विधानसभा चुनाव के लिए जारी की गई उम्मीदवार सूची ने साफ कर दिया है कि अब “काम करो या रास्ता देखो” की नीति केवल नारा नहीं, बल्कि लागू की जा चुकी रणनीति है। 74 मौजूदा विधायकों का टिकट काटना और 15 विधायकों के क्षेत्र बदलना इस बात का संकेत है कि पार्टी नेतृत्व चुनाव को बेहद गंभीरता से ले रहा है। यह फैसला अचानक नहीं है। पिछले पांच वर्षों के कार्यों, जनसंपर्क, संगठनात्मक सक्रियता और छवि के आधार पर हर सीट का मूल्यांकन किया गया। खासकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में, जहां पिछले लोकसभा चुनाव में समर्थन कमजोर हुआ था, वहां बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिला। PERFORMANCE को केंद्र में रखकर की गई यह छंटनी बताती है कि पार्टी अब केवल वफादारी नहीं, बल्कि परिणाम चाहती है।
बदलाव की राजनीति: पुरानों की छुट्टी, नए चेहरों की एंट्री
तृणमूल की इस सूची में कुल 291 उम्मीदवारों को जगह दी गई है। इनमें से लगभग 150 मौजूदा विधायक फिर से उम्मीदवार बनाए गए हैं, जबकि 74 विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाया गया। यह लगभग 33% की बड़ी कटौती है, जो अपने आप में अभूतपूर्व है। साथ ही, 15 विधायकों को उनके पुराने क्षेत्रों से हटाकर नए क्षेत्रों में भेजा गया है, ताकि उनकी पुरानी छवि का असर नए समीकरणों पर न पड़े। यह रणनीति साफ तौर पर चुनावी गणित और सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश है।
मुस्लिम उम्मीदवारों की स्थिति
इस बार की सूची में मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या भी उल्लेखनीय है। तृणमूल ने लगभग 47 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जो राज्य की सामाजिक संरचना और वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण संकेत है।यह संख्या दर्शाती है कि पार्टी अब भी अपने पारंपरिक समर्थन आधार को बनाए रखने के साथ-साथ नए समीकरणों को भी साधने की कोशिश कर रही है।
अभिषेक की रणनीति: संगठन से सरकार तक
अभिषेक बनर्जी की भूमिका इस पूरी प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण रही। उन्होंने पहले भी संगठन में “परफॉर्म या पेरिश” का सिद्धांत लागू किया था और अब उसी को सरकार और चुनावी रणनीति में उतार दिया गया है।आईपैक जैसी पेशेवर एजेंसी की रिपोर्ट के आधार पर हर सीट का विश्लेषण किया गया और फिर उम्मीदवार तय किए गए। इससे यह भी साफ होता है कि अब चुनाव केवल राजनीतिक अनुभव से नहीं, बल्कि डेटा और जमीनी रिपोर्ट के आधार पर लड़े जा रहे हैं।तृणमूल कांग्रेस का यह कदम साहसिक है। 15 साल की सत्ता के बाद एंटी-इनकंबेंसी का दबाव झेल रही पार्टी ने जोखिम उठाते हुए बड़े पैमाने पर बदलाव किया है।
यह रणनीति सफल होती है या नहीं, यह तो चुनाव परिणाम बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है — जहां टिकट का आधार केवल पहचान नहीं, बल्कि PERFORMANCE है।






