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प्रातिष्ठानिक रिगिंग: क्या मतदाता सूची के बहाने लोकतंत्र को कमजोर किया जा रहा है?

प्रातिष्ठानिक रिगिंग के आरोपों के बीच बंगाल में एसआईआर और मतदाता सूची विवाद पर गहराता राजनीतिक संकट, लोकतंत्र और चुनावी पारदर्शिता पर उठते गंभीर सवाल।

डॉ. मोहम्मद फारूक़, क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता, 7 मार्च 2026

प्रातिष्ठानिक रिगिंग की आशंका और लोकतंत्र का सवाल

प्रातिष्ठानिक रिगिंग—यह शब्द इन दिनों पश्चिम बंगाल की राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद लाखों मतदाताओं के नाम “समीक्षा के अधीन” बताए जाने से पूरे राज्य में असमंजस और चिंता का माहौल है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं होता, बल्कि मतदाता सूची से लेकर मतगणना तक की पूरी प्रक्रिया उसकी आत्मा होती है। जब इसी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगें, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में शंका पैदा होती है।

भारतीय राजनीति में चुनावी धांधली का इतिहास नया नहीं है। आज़ादी के बाद के दशकों में भी कई बार यह आरोप लगा कि चुनावों में बूथ कब्ज़ा, फर्जी मतदान और मतदाता सूची में हेरफेर जैसी घटनाएं हुईं। बंगाल की राजनीति में “साइंटिफिक रिगिंग” जैसे शब्द कभी आम चर्चा का हिस्सा रहे हैं। लेकिन मौजूदा विवाद में जो आरोप सामने आ रहे हैं, वे एक नए स्तर की ओर इशारा करते हैं—जहां चुनावी प्रक्रिया के संस्थागत ढांचे पर ही सवाल खड़े किए जा रहे हैं।

राज्य में करीब 60 लाख मतदाताओं के नाम समीक्षा के दायरे में आने की खबर ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने या रोकने का सिलसिला बड़े पैमाने पर हुआ है।

यहीं से प्रातिष्ठानिक रिगिंग का आरोप जन्म लेता है। आलोचकों का कहना है कि यदि मतदाता सूची ही संदिग्ध हो जाए तो चुनाव की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते हैं। दूसरी ओर, प्रशासन और चुनाव से जुड़े अधिकारी इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि यह केवल तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है।

आज के डिजिटल दौर में सूचनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं। मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और दावों ने भी इस बहस को और तीखा बना दिया है। कुछ मामलों में ऐसे लोग भी सामने आए हैं जिन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से प्रभावित बताया है, जिससे जनता में असुरक्षा और भ्रम दोनों पैदा हो रहे हैं।

बंगाल की राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहां चुनावी प्रतिस्पर्धा हमेशा तीखी रही है। वामपंथी शासन के लंबे दौर में भी चुनावी प्रक्रिया को लेकर बहसें और आरोप-प्रत्यारोप होते रहे।

कई विश्लेषकों का मानना है कि राजनीतिक दल अक्सर अतीत के उदाहरणों का इस्तेमाल वर्तमान आरोपों को मजबूत करने के लिए करते हैं। लेकिन वास्तविक चुनौती यह है कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता को बनाए रखा जाए।

आज जो स्थिति बनी है, उसमें मतदाता सूची का सवाल केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया है। यह सीधे-सीधे नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन गया है। यदि किसी स्थायी निवासी का नाम सूची से हटता है, तो उसके लिए यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित होने जैसा है।

भारतीय राजनीति में यह भी देखा गया है कि चुनाव से पहले राजनीतिक रणनीतियां तेज हो जाती हैं। कभी केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठते हैं, तो कभी आर्थिक योजनाओं या फंडिंग को लेकर विवाद सामने आते हैं।

इसी परिप्रेक्ष्य में कुछ राजनीतिक दल एसआईआर प्रक्रिया को एक व्यापक रणनीति का हिस्सा बताते हैं। उनका दावा है कि इससे कुछ खास वर्गों के मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि चुनाव आयोग जैसे संस्थान हमेशा यह दावा करते हैं कि वे पूरी तरह निष्पक्ष और संवैधानिक दायरे में काम करते हैं। इसलिए इन आरोपों की सच्चाई का फैसला केवल राजनीतिक बयानबाज़ी से नहीं, बल्कि पारदर्शी जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही हो सकता है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अब कई लोगों की निगाहें देश की सर्वोच्च अदालत पर टिकी हैं। अदालत पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो पूरी प्रक्रिया को निरस्त किया जा सकता है।

इसी वजह से आगामी सुनवाई को लेकर राज्य में व्यापक चर्चा है। लोग उम्मीद कर रहे हैं कि न्यायिक हस्तक्षेप से इस विवाद का स्पष्ट समाधान निकलेगा और मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।

लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव जीतने या हारने में नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया की विश्वसनीयता में होती है जिसके माध्यम से जनता अपनी आवाज़ दर्ज कराती है।

आज बंगाल में जो बहस चल रही है, वह केवल एक राज्य का राजनीतिक विवाद नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल है—क्या चुनावी प्रक्रिया इतनी पारदर्शी है कि हर नागरिक को भरोसा रहे कि उसका वोट सुरक्षित है?

यदि इस विश्वास में दरार आती है, तो लोकतंत्र की नींव भी कमजोर पड़ने लगती है। इसलिए जरूरी है कि हर आरोप की निष्पक्ष जांच हो और हर नागरिक को यह भरोसा दिलाया जाए कि उसका मताधिकार किसी भी परिस्थिति में सुरक्षित रहेगा।

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