रंग अड्डा के 45वें आयोजन में कोलकाता की लिटिल थेस्पियन संस्था ने मुंशी प्रेमचंद, फ्रांज़ काफ्का और केदारनाथ सिंह के साहित्य पर विस्तृत चर्चा आयोजित की। कार्यक्रम में विद्वानों, रंगकर्मियों और विद्यार्थियों ने साहित्य, रंगमंच और समकालीन चिंतन पर अपने विचार साझा किए।
लिटिल थेस्पियन के 45वें रंग अड्डा में देश के प्रख्यात विद्वानों, रंगकर्मियों और विद्यार्थियों ने साहित्य, रंगमंच और समकालीन चिंतन पर साझा किए अपने विचार
Qalam Times News Network
कोलकाता | 15 जुलाई 2026
कोलकाता: रंग अड्डा केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि साहित्य, रंगमंच और विचारों के जीवंत संवाद का ऐसा मंच बन चुका है, जहाँ विभिन्न पीढ़ियों के साहित्यकार, रंगकर्मी, शिक्षक और विद्यार्थी एक साथ बैठकर भारतीय एवं विश्व साहित्य की विरासत पर गंभीर मंथन करते हैं। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कोलकाता की प्रतिष्ठित हिंदी-उर्दू नाट्य संस्था लिटिल थेस्पियन ने संतोषपुर स्थित अनुचिंतन के सहयोग से 12 जुलाई 2026 को अपराह्न 3 बजे अनुचिंतन आर्ट सेंटर में अपना 45वाँ रंग अड्डा सफलतापूर्वक आयोजित किया। इस विशेष सत्र में हिंदी और विश्व साहित्य के तीन महत्वपूर्ण रचनाकार—मुंशी प्रेमचंद, फ्रांज़ काफ्का और केदारनाथ सिंह—के साहित्यिक, वैचारिक और सांस्कृतिक योगदान पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम में शहर के शिक्षाविदों, रंगकर्मियों, विद्यार्थियों तथा साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ लिटिल थेस्पियन की निदेशक उमा झुनझुनवाला के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने कहा कि आज के समय में विद्यालयों और महाविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था में रंगमंच को अधिक प्रभावी ढंग से शामिल करने की आवश्यकता है, क्योंकि नाटक विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, अभिव्यक्ति, नेतृत्व क्षमता और रचनात्मक सोच विकसित करने का सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहा कि रंग अड्डा का उद्देश्य केवल साहित्य पर चर्चा करना नहीं, बल्कि साहित्य और रंगमंच को समाज के प्रत्येक वर्ग तक सहज रूप से पहुँचाना भी है, ताकि संवाद, चिंतन और कलात्मक अभिव्यक्ति की नई संभावनाएँ विकसित हो सकें।

कार्यक्रम के प्रथम अकादमिक सत्र में खिदिरपुर कॉलेज की प्रो. डॉ. इतु सिंह ने मुंशी प्रेमचंद के नाट्य साहित्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने प्रेमचंद के चर्चित नाटक ‘कर्बला‘ की रचना प्रक्रिया, कथानक, वैचारिक पक्ष तथा उसके मंचन में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों का विश्लेषण किया। उन्होंने यह भी बताया कि प्रेमचंद की कहानियाँ अनेक बार रंगमंच पर सफलतापूर्वक प्रस्तुत की गई हैं, लेकिन उनके मौलिक नाटकों का मंचन अपेक्षाकृत कम हुआ है। उन्होंने प्रेमचंद के नाटक ‘दुराशा‘ की तुलना रवीन्द्रनाथ ठाकुर की समान शीर्षक वाली रचना से करते हुए दोनों लेखकों की दृष्टि और संवेदना का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया। साथ ही ‘संग्राम‘ जैसे नाटकों के मंचन में आने वाली तकनीकी कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रेमचंद की भाषा की सहजता, स्पष्टता और सामाजिक सरोकारों को उनकी सबसे बड़ी साहित्यिक शक्ति बताया।
इसके बाद प्रसिद्ध उर्दू नाटककार ज़हीर अनवर ने विश्व साहित्य के महान लेखक फ्रांज़ काफ्का के साहित्यिक दर्शन पर अत्यंत प्रभावशाली व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि काफ्का आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन, असुरक्षा, अस्तित्व संकट और पहचान की जटिलताओं के सबसे महत्वपूर्ण साहित्यकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने काफ्का को “जागते हुए स्वप्न देखने वाला लेखक” बताते हुए कहा कि उनकी रचनाएँ मनुष्य के भीतर चल रहे मानसिक संघर्षों को अत्यंत गहराई से व्यक्त करती हैं। उन्होंने ‘द ट्रायल‘ और ‘द कैसल‘ जैसी विश्वप्रसिद्ध कृतियों का उल्लेख करते हुए बताया कि काफ्का के अधिकांश पात्र अपनी पहचान और उद्देश्य की निरंतर खोज में भटकते दिखाई देते हैं। कई पात्रों का केवल नाम का पहला अक्षर या बिना नाम के प्रस्तुत किया जाना भी इसी अस्तित्ववादी चिंतन का प्रतीक है।

कार्यक्रम के अगले चरण में खिदिरपुर कॉलेज की छात्राओं श्वेता राजभर, ख़ालिदा खातून, सजदा खातून, नेहा खातून और राखी मंडल ने हिंदी के प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह की चर्चित कविता ‘बाघ‘ का प्रभावशाली नाट्य पाठ प्रस्तुत किया। विद्यार्थियों की इस प्रस्तुति ने उपस्थित दर्शकों को कविता की संवेदनशीलता और रंगमंचीय संभावनाओं से परिचित कराया तथा पूरे सभागार में गंभीर साहित्यिक वातावरण निर्मित कर दिया।
नाट्य पाठ के बाद बंगाबासी कॉलेज के डॉ. विनय मिश्रा ने केदारनाथ सिंह की काव्य-दृष्टि और विशेष रूप से कविता ‘बाघ‘ की बहुआयामी व्याख्या प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि आधुनिक हिंदी कविता में केदारनाथ सिंह की विशिष्ट पहचान बनाने में अज्ञेय की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कहा कि ‘बाघ‘ केवल एक कविता नहीं, बल्कि अनेक अर्थों, प्रतीकों और मानवीय अनुभवों से निर्मित ऐसी रचना है, जो प्रत्येक पाठ में नए अर्थ खोलती है। उन्होंने कविता की भाषा, प्रतीकात्मकता और उसकी वैचारिक गहराई पर विस्तार से चर्चा की।
समापन सत्र में गोखले मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज की प्रो. रेशमी पांडा मुखर्जी ने कविता ‘बाघ‘ के दार्शनिक एवं अस्तित्ववादी पक्षों का विश्लेषण किया। उन्होंने कहा कि यह कविता केवल मनुष्य और प्रकृति के संबंधों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बदलते समय, सामाजिक चेतना और मनुष्य की आत्मिक यात्रा को भी अभिव्यक्त करती है। उनके अनुसार इस कविता में मानव मन की जटिलताओं, संवेदनाओं और पहचान के अनेक स्तर मौजूद हैं, जो इसे समकालीन हिंदी कविता की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में शामिल करते हैं।
पूरे कार्यक्रम का संचालन लिटिल थेस्पियन की सदस्य संगीता व्यास ने अत्यंत सहज और प्रभावशाली ढंग से किया। उनके कुशल संचालन ने कार्यक्रम को निरंतर गतिशील बनाए रखा। आयोजन के अंत में सभी आमंत्रित वक्ताओं को पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। इसके पश्चात डॉ. गौरव दास ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों तथा उपस्थित श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया। इसी के साथ 45वाँ रंग अड्डा साहित्य, रंगमंच और बौद्धिक संवाद की नई ऊर्जा के साथ गरिमापूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।







