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बुलडोज़र कार्रवाई : तोपसिया की डेल्टा लेदर फैक्ट्री ढाई गई, मालिक ने कहा– “मेरे पास सभी वैध दस्तावेज़ मौजूद थे”

बुलडोज़र कार्रवाई के बीच कोलकाता के तोपसिया स्थित डेल्टा लेदर फैक्ट्री को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया। फैक्ट्री मालिक जफर निसार ने दावा किया है कि उनके पास वैध फैक्ट्री लाइसेंस, बीमा और सरकारी प्लान अप्रूवल मौजूद था। MLA जावेद अहमद खान और स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

Qalam Times News Network
कोलकाता | 14 मई 2026

बुलडोज़र कार्रवाई के बीच कोलकाता के तोपसिया इलाके में स्थित डेल्टा लेदर कॉरपोरेशन की बहुमंजिला फैक्ट्री को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया। आग लगने की भयावह घटना में दो लोगों की मौत और कई लोगों के झुलसने के बाद राज्य सरकार ने सख्त रुख अपनाते हुए इमारत को “अवैध निर्माण” घोषित किया और कुछ ही घंटों में बुलडोज़र चला दिया। लेकिन अब इस पूरी कार्रवाई पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि फैक्ट्री मालिक जफर निसार का दावा है कि उनके पास फैक्ट्री संचालन से जुड़े सभी आवश्यक सरकारी लाइसेंस, बीमा और अनुमोदन मौजूद थे, जिन्हें प्रशासन ने देखने तक की ज़रूरत नहीं समझी।

बुलडोज़र

आग, गिरफ्तारी और फिर अचानक बुलडोज़र

मंगलवार को तोपसिया के जी.जे. खान रोड स्थित चमड़ा फैक्ट्री में भीषण आग लग गई। हादसे में दो लोगों की मौत हो गई जबकि कई कर्मचारी गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद पुलिस ने फैक्ट्री मालिक जफर निसार को गिरफ्तार कर लिया। इसके कुछ घंटों बाद ही प्रशासन ने पूरी इमारत को अवैध बताते हुए ध्वस्तीकरण शुरू कर दिया।
सरकार की ओर से दावा किया गया कि भवन के पास वैध बिल्डिंग प्लान और अग्निशमन विभाग का आवश्यक प्रमाणपत्र नहीं था। मुख्यमंत्री ने इसे “जीरो टॉलरेंस नीति” का हिस्सा बताते हुए कोलकाता के कई इलाकों में चल रही अवैध फैक्ट्रियों और निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए।
लेकिन इसी बुलडोज़र कार्रवाई के बीच अब फैक्ट्री मालिक की ओर से सामने आए दस्तावेज़ प्रशासनिक दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

फैक्ट्री मालिक की दलील: “मेरे पास वैध लाइसेंस और इंश्योरेंस था”

बुलडोज़र

डेल्टा लेदर कॉरपोरेशन के मालिक जफर निसार का कहना है कि उनकी फैक्ट्री 1998 से पंजीकृत है और पश्चिम बंगाल फैक्ट्री निदेशालय द्वारा जारी लाइसेंस वर्ष 2029 तक वैध था। दस्तावेज़ों के अनुसार फैक्ट्री को पश्चिम बंगाल सरकार के फैक्ट्री निदेशालय से आधिकारिक अनुमति प्राप्त थी।
फैक्ट्री मालिक के अनुसार:

  • फैक्ट्री का लाइसेंस 31 दिसंबर 2029 तक वैध था।
  • जनवरी 2024 में फैक्ट्री प्लान को भी सरकारी स्वीकृति मिली थी।
  • टाटा एआईजी से ₹1.05 करोड़ का बीमा कवर भी लिया गया था, जिसमें फैक्ट्री, मशीनरी और स्टॉक शामिल था।
  • दस्तावेज़ों में फैक्ट्री का पता, मशीनरी, कर्मचारियों की संख्या और सुरक्षा प्रावधानों का उल्लेख भी मौजूद है।बीमा दस्तावेज़ में स्पष्ट रूप से “Factory: MFG & Exporter of Leather Goods” लिखा गया है और जोखिम स्थान वही जी.जे. खान रोड का पता दर्ज है, जहां घटना हुई।

जफर निसार का दावा है कि फैक्ट्री चलाने के लिए जितनी सरकारी मंजूरियां, लाइसेंस और कागजात की आवश्यकता होती है, वे सभी उनके पास मौजूद थे। उनका आरोप है कि प्रशासन ने न तो इन दस्तावेज़ों को ठीक से देखा और न ही उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। पहले गिरफ्तारी की गई और फिर पूरी इमारत को बुलडोज़र से ढहा दिया गया।

क्या प्रशासन ने दस्तावेज़ों की जांच किए बिना कार्रवाई कर दी?

अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि यदि फैक्ट्री के पास वैध फैक्ट्री लाइसेंस, बीमा और प्लान अप्रूवल मौजूद था, तो प्रशासन ने उन्हें अमान्य क्यों माना? क्या केवल फायर एनओसी की कमी के आधार पर पूरी इमारत को अवैध घोषित कर ध्वस्त करना उचित था? या फिर यह कार्रवाई जल्दबाजी में की गई?
फैक्ट्री मालिक के करीबी लोगों का आरोप है कि प्रशासन ने न तो उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका दिया और न ही किसी न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार किया। पहले गिरफ्तारी हुई और फिर पूरी इमारत जमींदोज़ कर दी गई।

स्थानीय MLA जावेद अहमद खान और वार्ड काउंसलर बेटे की चुप्पी

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा तोपसिया इलाके के प्रभावशाली विधायक जावेद अहमद खान और उनके बेटे की हो रही है, जो इलाके के वार्ड काउंसलर बताए जाते हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इलाके में वर्षों से चल रहे निर्माण कार्यों और फैक्ट्रियों की जानकारी जनप्रतिनिधियों को होती है, लेकिन हादसे और बुलडोज़र कार्रवाई के बाद दोनों सार्वजनिक रूप से कहीं नजर नहीं आए।
लोगों का कहना है कि यदि इमारत वास्तव में अवैध थी तो इतने वर्षों तक प्रशासन और जनप्रतिनिधि मौन क्यों रहे? और अगर वैध दस्तावेज़ मौजूद थे, तो फिर अचानक पूरी जिम्मेदारी सिर्फ फैक्ट्री मालिक पर क्यों डाल दी गई?
स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि इलाके में कथित अवैध निर्माणों के पीछे राजनीतिक संरक्षण की भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

अवैध निर्माण पर फिर शुरू हुई बहस

तोपसिया हादसे के बाद कोलकाता में अवैध निर्माण और बिना मानक के चल रही फैक्ट्रियों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दशकों तक वोट बैंक की राजनीति के कारण कई इलाकों में नियमों की अनदेखी की गई, जिसका खामियाजा अब आम लोग भुगत रहे हैं।
हालांकि दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता यह सवाल भी उठा रहे हैं कि किसी हादसे के बाद बिना विस्तृत कानूनी प्रक्रिया के सीधे बुलडोज़र चलाना क्या संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप है?

प्रशासन का दावा बनाम दस्तावेज़ों की सच्चाई

सरकारी जांच समिति ने इमारत को गैरकानूनी बताते हुए कहा कि वहां अग्निशमन सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी और फैक्ट्री आवासीय ढांचे में चल रही थी। वहीं दूसरी ओर उपलब्ध दस्तावेज़ों में फैक्ट्री के प्लान, मशीनरी, कर्मचारियों की संख्या और अग्निशमन प्रावधानों का उल्लेख मिलता है।
फैक्ट्री प्लान अप्रूवल पत्र में यह भी कहा गया था कि अग्निशमन सुरक्षा और सुरक्षित निकासी व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
अब जांच का सबसे अहम विषय यही बनता जा रहा है कि प्रशासनिक रिकॉर्ड और जमीनी कार्रवाई में इतना बड़ा अंतर आखिर क्यों दिखाई दे रहा है।

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