पश्चिम बंगाल कोयला घोटाला मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अमित शाह और शुभेंदु अधिकारी पर गंभीर आरोप लगाए हैं। क्या यह भ्रष्टाचार की जांच के नाम पर केवल एक राजनीतिक सेटिंग है? जानिए कलम टाइम्स की विशेष रिपोर्ट।
कलम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क | कोलकाता 16 जनवरी, 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में भ्रष्टाचार और आरोपों का दौर एक नए मोड़ पर पहुँच गया है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक जनसभा में सनसनीखेज आरोप लगाते हुए सीधे तौर पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सेटिंग के खेल में घसीटा है। मुख्यमंत्री का दावा है कि अवैध कोयला तस्करी से उगाहे गए करोड़ों रुपयों का एक बड़ा हिस्सा न केवल स्थानीय नेताओं तक सीमित है, बल्कि इसका सीधा मार्ग देश के गृह मंत्री के दफ्तर तक भी जाता है। मुख्यमंत्री के अनुसार, इस पूरे नेटवर्क में बिचौलियों की एक लंबी श्रृंखला सक्रिय है।
भ्रष्टाचार की कड़ियाँ: जगन्नाथ से शुभेंदु और फिर दिल्ली
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विस्तार से बताया कि कोयला तस्करी का पैसा किस तरह नीचे से ऊपर तक पहुँचता है। उनके वक्तव्य के अनुसार, भाजपा नेता जगन्नाथ चटर्जी इस श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जो अवैध धन को शुभेंदु अधिकारी तक पहुँचाते हैं। शुभेंदु अधिकारी, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस ‘गद्दार’ कहकर संबोधित करती है, कथित तौर पर उस धन को अमित शाह तक पहुँचाने का माध्यम बनते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि राजनीति के गलियारों में इसे एक सोची-समझी सेटिंग के रूप में देखा जा रहा है। आरोप है कि जब शुभेंदु अधिकारी तृणमूल में थे, तब यही पैसा ‘कालीघाट’ (मुख्यमंत्री का निवास क्षेत्र) जाता था, लेकिन दल बदलने के बाद अब धन का प्रवाह दिल्ली की ओर मुड़ गया है। इसी कारण से टीएमसी नेतृत्व अब शुभेंदु अधिकारी को न केवल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बल्कि भ्रष्टाचार के नए सिंडिकेट का मुख्य संचालक मान रहा है।
पैन ड्राइव का रहस्य और ‘चुप्पी‘ की राजनीति
मुख्यमंत्री ने यह भी खुलासा किया कि उनके पास इन तमाम आरोपों को सिद्ध करने के लिए पुख्ता सबूत एक पैन ड्राइव में सुरक्षित हैं। उन्होंने कहा:
“मेरे पास सारे दस्तावेज़ और डिजिटल प्रमाण मौजूद हैं। यदि मैं इसे सार्वजनिक कर दूँ, तो दुनिया भर में हंगामा मच जाएगा। हमने अब तक केवल राजनीतिक शिष्टाचार और सौजन्य के नाते इसे दबाए रखा था।”
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान दरअसल एक ‘समझौते’ का संकेत है। जब केंद्रीय एजेंसियां (I-PAC या अन्य दफ्तरों पर) कार्रवाई करती हैं, तब मुख्यमंत्री जवाबी हमले की चेतावनी देती हैं। यह एक ऐसी सेटिंग की ओर इशारा करता है जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की कमजोरियों को जानते हैं, लेकिन कार्रवाई तभी होती है जब राजनीतिक हितों पर आंच आती है।
संवैधानिक संकट और कानून की भूमिका
इस पूरे प्रकरण ने देश की कानूनी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लेख में उठाए गए तर्कों के अनुसार, यदि मुख्यमंत्री के पास गृह मंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत हैं, तो उन्होंने इसे इतने समय तक छिपाकर क्यों रखा? क्या यह अपराध को बढ़ावा देना नहीं है? वहीं दूसरी ओर, यदि देश के गृह मंत्री पर इतने गंभीर आरोप लग रहे हैं, तो केंद्रीय एजेंसियां खामोश क्यों हैं?
राज्य पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों के बीच का टकराव अब सड़कों पर भी दिखने लगा है। जब जांच एजेंसियां छापेमारी करती हैं, तो राज्य प्रशासन उसमें बाधा डालता है, और जब राज्य सरकार आरोप लगाती है, तो केंद्र चुप्पी साध लेता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि जनता के पैसे की लूट से ज्यादा प्राथमिकता राजनीतिक वर्चस्व और आपसी ‘सेटिंग’ को दी जा रही है।






