रंग अड्डा के 42वें संस्करण में लिटिल थेस्पियन ने डॉ. प्रताप सहगल के नाटक और सुमित्रानंदन पंत की कविता के माध्यम से साहित्य और रंगमंच का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। रंग अड्डा में विद्वानों, कलाकारों और रंगप्रेमियों की उल्लेखनीय भागीदारी रही।
लिटिल थेस्पियन ने सुमित्रानंदन पंत और डॉ. प्रताप सहगल को समर्पित किया विशेष आयोजन, नाट्य प्रस्तुति और साहित्यिक विमर्श ने बांधा समां।
Qalam Times News Network
कोलकाता | 1 जून 2026
रंग अड्डा ने एक बार फिर कोलकाता के सांस्कृतिक परिदृश्य में अपनी विशिष्ट पहचान को मजबूत करते हुए साहित्य और रंगमंच के प्रेमियों को एक मंच पर एकत्र किया। शहर के प्रतिष्ठित हिंदी-उर्दू नाट्य समूह लिटिल थेस्पियन द्वारा 31 मई 2026 को त्रिप्ति मित्रा सभागार में आयोजित 42वें रंग अड्डा ने कला, साहित्य और रंगमंच के विविध आयामों को जीवंत रूप से प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का मुख्य केंद्र हिंदी साहित्य के दो महान रचनाकार—प्रख्यात कवि सुमित्रानंदन पंत और चर्चित नाटककार डॉ. प्रताप सहगल—रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. प्रताप सहगल के चर्चित नाटक ‘कोई और रास्ता’ की प्रभावशाली एकल प्रस्तुति से हुई। इस नाट्य प्रस्तुति को लिटिल थेस्पियन की निदेशक उमा झुनझुनवाला ने अपने सशक्त अभिनय से जीवंत बनाया। उनकी भावपूर्ण अभिव्यक्ति, संवादों की गहराई और मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति ने दर्शकों को नाटक के साथ अंत तक जोड़े रखा। प्रस्तुति के बाद उपस्थित दर्शकों ने उनकी कला की भरपूर सराहना की और नाटक में उठाए गए सामाजिक एवं मानवीय प्रश्नों पर गंभीर चिंतन भी किया।

रंग अड्डा में डॉ. प्रताप सहगल के साहित्य पर गहन चर्चा
रंग अड्डा के दूसरे चरण में गोखले मेमोरियल गर्ल्स कॉलेज के हिंदी विभाग की प्राध्यापिका प्रो. डॉ. रेशमी पांडा मुखर्जी ने डॉ. प्रताप सहगल के साहित्यिक और नाट्य अवदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सहगल के नाटकों में हमेशा एक खोज छिपी होती है—ऐसी खोज जो मनुष्य की सामान्य समझ से आगे जाकर जीवन और समाज के गहरे सत्य की तलाश करती है।
प्रो. मुखर्जी ने यह भी रेखांकित किया कि एक सफल नाटककार के लिए दर्शकों, निर्देशकों और कलाकारों के साथ सतत संवाद बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है और डॉ. सहगल इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने सहगल के प्रसिद्ध नाटक ‘अन्वेषक’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कृति रूढ़िवादी और कट्टर सोच के विरुद्ध एक सशक्त संदेश देती है तथा प्रगति और परिवर्तन की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
अपने व्याख्यान में उन्होंने सहगल के अन्य चर्चित नाटकों—‘रंग बसंती’, ‘बुल्लेशाह’ और ‘यूँ बनी महाभारत’—पर भी प्रकाश डाला तथा उनके साहित्यिक महत्व और सामाजिक प्रासंगिकता की चर्चा की।
सुमित्रानंदन पंत की कविता की नाट्य प्रस्तुति ने मोहा मन
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत की कालजयी कविता ‘वो आँखें’ की नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस प्रस्तुति को संतोषपुर अनुचिंतन के कलाकारों ने मंचित किया, जबकि इसकी परिकल्पना और निर्देशन डॉ. गौरव दास ने किया था।
सौंदर्यबोध और कलात्मकता से परिपूर्ण इस प्रस्तुति में कविता के भावों को अभिनय, संगीत और मंच-संरचना के माध्यम से अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। डॉ. गौरव दास की आत्मीय और मधुर स्वर-लहरियों ने पूरी प्रस्तुति को और अधिक भावपूर्ण बना दिया। दर्शकों ने कलाकारों के प्रयासों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और प्रस्तुति के अंत में जोरदार तालियों से उनका स्वागत किया।
पंत की साहित्यिक विरासत पर विचार
कार्यक्रम के समापन सत्र में विश्व हिंदी परिषद, पश्चिम बंगाल इकाई की शिक्षा शाखा की अध्यक्ष श्रीमती श्वेता गुप्ता ने सुमित्रानंदन पंत के साहित्यिक योगदान, उनकी काव्य-दृष्टि और आधुनिक समय में उनकी प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।
उन्होंने कहा कि पंत का साहित्य केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें मानवीय संवेदनाओं, प्रकृति प्रेम और सामाजिक चेतना का भी अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। उन्होंने कलाकारों द्वारा प्रस्तुत कविता की नाट्य व्याख्या की भी सराहना की।
गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति से बढ़ी गरिमा
इस अवसर पर हिंदी रंगमंच के जाने-माने समीक्षक श्री प्रेम कपूर, प्रख्यात गुजराती रंग निर्देशक श्री दिनेश वडेरा, साहित्य, रंगमंच और शिक्षा जगत से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तित्व तथा बड़ी संख्या में रंगप्रेमी उपस्थित रहे। वक्ताओं और अतिथियों के प्रेरणादायक विचारों ने पूरे आयोजन को एक नई ऊँचाई प्रदान की।
रचनात्मकता और संवाद का सफल मंच
42वाँ रंग अड्डा केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि साहित्य, कला और विचारों के आदान-प्रदान का जीवंत मंच साबित हुआ। इस आयोजन ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि लिटिल थेस्पियन पिछले 32 वर्षों से बंगाल में हिंदी-उर्दू रंगमंच की परंपरा को न केवल जीवित रखे हुए है, बल्कि उसे नई पीढ़ियों तक भी सफलतापूर्वक पहुँचा रहा है।
कार्यक्रम के अंत में प्रतिभागियों और दर्शकों ने भविष्य में होने वाले आयोजनों के प्रति उत्साह व्यक्त किया और इसे कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में एक यादगार उपलब्धि बताया।







