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Homeबंगालप्रतीक उर के निष्कासन से CPI(M) में हलचल, जिलों में बढ़ा असंतोष

प्रतीक उर के निष्कासन से CPI(M) में हलचल, जिलों में बढ़ा असंतोष

प्रतीक उर के तृणमूल में शामिल होते ही CPI(M) से निष्कासन, जिलों में बढ़ता असंतोष और अलीमुद्दीन पर दबाव की पूरी खबर पढ़ें।

Qalam Times News Network
कोलकाता | 22 February 2026

प्रतीक उर के तृणमूल में शामिल होते ही कार्रवाई, पार्टी दफ्तर अलीमुद्दीन पर बढ़ा दबाव

प्रतीक

प्रतीक उर के तृणमूल कांग्रेस में शामिल होते ही CPI(M) ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया, जिसके बाद राज्य की वाम राजनीति में हलचल तेज हो गई है। शनिवार को जैसे ही उन्होंने अभिषेक बनर्जी के हाथों तृणमूल का झंडा थामा, अलीमुद्दीन स्थित पार्टी मुख्यालय पर दबाव बढ़ गया। पार्टी की ओर से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया गया कि संविधान की धारा 19 और उपधारा 56 के तहत यह कार्रवाई की गई है।

दरअसल, प्रतीक उर को लेकर पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर मतभेद चल रहे थे। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में लिखे गए एक पत्र के बाद राज्य कमेटी चाहती तो पहले ही अनुशासनात्मक कदम उठा सकती थी, लेकिन तब ऐसा नहीं किया गया। पार्टी के एक वर्ग ने उन्हें साथ बनाए रखने की कोशिश भी की। वरिष्ठ नेता विमान बोस ने भी संपर्क साधा था, मगर कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। तृणमूल में औपचारिक शामिल होने के बाद ही निष्कासन का फैसला सामने आया।

इस पूरे घटनाक्रम पर युवा नेता शतरूप घोष की टिप्पणी ने विवाद को और हवा दी। उन्होंने घुमाकर ‘गाय-बकरी’ शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि पुराने प्रतीक उर अब उनके लिए “मृत” हैं। इसके बाद सोशल मीडिया पर भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

इधर, प्रतीक उर के पार्टी छोड़ने के साथ ही विभिन्न जिलों से असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। टॉलीगंज विधानसभा क्षेत्र के दक्षिण जादवपुर-1 एरिया कमेटी में हाल ही में 63 लोगों ने इस्तीफा दिया है। इनमें 3 एरिया कमेटी सदस्य और कुल 7 पार्टी सदस्य शामिल बताए जा रहे हैं। इस घटनाक्रम पर तृणमूल के पार्षद और प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने सोशल मीडिया पोस्ट में तंज कसते हुए लिखा कि “प्रतीक उर रहमान अमतला में अभिषेक बनर्जी के कार्यालय पहुंचे और इधर दक्षिण जादवपुर-1 एरिया कमेटी के 65 नेता पार्टी छोड़ गए।”

जानकारी के मुताबिक, संगठनात्मक विवाद से नाराज होकर इन 63 नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस्तीफा दिया। उनका आरोप है कि जिला या राज्य कमेटी ने उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिए अब तक कोई ठोस पहल नहीं की। इससे स्थानीय स्तर पर नाराजगी और गहरी हो गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम आने वाले समय में वाम दलों की आंतरिक स्थिति पर असर डाल सकता है, खासकर तब जब राज्य की राजनीति पहले से ही तेज़ी से बदलते समीकरणों के दौर से गुजर रही है।

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