ओबीसी जनगणना को लेकर विवाद तेज़: जनगणना फॉर्म में ओबीसी का उल्लेख नहीं, 2027 की जनगणना, आरक्षण नीति और सामाजिक न्याय पर क्या पड़ेगा असर—पूरी रिपोर्ट।
Qalam Times News Network
नई दिल्ली | 24 जनवरी 2026
जनगणना फॉर्म से ओबीसी का नाम गायब, क्या फिर दोहराया जाएगा 2011 जैसा घालमेल?

ओबीसी जनगणना को लेकर एक नई बहस देश में तेज़ हो गई है। वजह है—आगामी जनगणना के पहले चरण के लिए जारी किए गए आधिकारिक प्रश्न-पत्र, जिनमें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) का स्पष्ट उल्लेख है, लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी का नाम नदारद है। इस चूक को लेकर सामाजिक न्याय के पक्षधर और राजनीतिक विश्लेषक गंभीर सवाल उठा रहे हैं कि क्या 2027 की जनगणना में ओबीसी की वास्तविक संख्या एक बार फिर दर्ज नहीं हो पाएगी।
यह सवाल ऐसे समय खड़ा हुआ है जब देश की सबसे बड़ी सांख्यिकीय प्रक्रिया—जनगणना—की तैयारी औपचारिक रूप से शुरू हो चुकी है। रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (आरजीआई) ने पहले चरण, यानी हाउस लिस्टिंग के लिए 33 सवालों वाला फॉर्म जारी किया है। इन्हीं सवालों में ओबीसी जनगणना से जुड़ा कोई सीधा उल्लेख न होना, कई लोगों को 2011 के सोशियो-इकोनॉमिक एंड कास्ट सेंसस (एसईसीसी) की याद दिला रहा है, जिसमें ओबीसी से संबंधित आंकड़े आज तक आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किए गए।

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इस स्थिति को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यह “जातिगत जनगणना को कमजोर करने की प्रक्रिया की शुरुआत” हो सकती है। उनके अनुसार, जब एससी और एसटी की पहचान स्पष्ट रूप से फॉर्म में दर्ज है, तो ओबीसी को अलग रखने का कोई तार्किक कारण समझ में नहीं आता। इससे यह आशंका जन्म लेती है कि सरकार ओबीसी की वास्तविक जनसंख्या को लेकर असहज है।
सवाल सिर्फ एक कॉलम या शब्द का नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव हैं। यदि ओबीसी जनगणना के आंकड़े सामने आते हैं, तो आरक्षण नीति, संसाधनों के बंटवारे और कल्याणकारी योजनाओं की दिशा में बड़े बदलाव संभव हैं। माना जाता है कि यदि ओबीसी आबादी 45 प्रतिशत से अधिक प्रमाणित होती है, तो 27 प्रतिशत आरक्षण सीमा पर पुनर्विचार की मांग तेज़ हो सकती है। इससे 50 प्रतिशत आरक्षण की संवैधानिक सीमा, उप-वर्गीकरण और यहां तक कि निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसे मुद्दे फिर से केंद्र में आ सकते हैं।
सरकारी कार्यक्रम के अनुसार, जनगणना 2027 दो चरणों में होगी। पहला चरण—हाउस लिस्टिंग—1 अप्रैल 2026 से शुरू होकर सितंबर 2026 तक चलेगा। दूसरा चरण, जिसमें व्यक्तियों की गणना होगी, फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि यह पहली डिजिटल जनगणना होगी और 1931 के बाद पहली बार जाति से संबंधित आंकड़े भी जुटाए जाएंगे।
योगेंद्र यादव और सामाजिक न्याय से जुड़े अन्य विचारकों का कहना है कि जाति की गणना को जनगणना से अलग नहीं किया जाना चाहिए। उनका यह भी तर्क है कि सिर्फ एससी, एसटी और ओबीसी तक सीमित न रहकर सामान्य वर्ग की जातियों की भी गिनती होनी चाहिए, ताकि समाज में मौजूद विशेषाधिकार और असमानता की पूरी तस्वीर सामने आ सके। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि इस प्रक्रिया को नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) से जोड़ने पर पूरा अभ्यास विवादों में फंस सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ओबीसी जनगणना को पारदर्शी और ईमानदार तरीके से अंजाम दिया गया, तो यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हो सकता है। लेकिन अगर 2011 की तरह आंकड़े अधूरे या अप्रकाशित रह गए, तो न केवल भरोसा टूटेगा, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक तनाव भी बढ़ेगा।
अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं—क्या यह सिर्फ तकनीकी कमी है, या फिर एक सोची-समझी रणनीति? इसका जवाब 2027 की जनगणना की प्रक्रिया और उसके नतीजे ही देंगे।






