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विरासत स्मरण: हिंदी–उर्दू अकादमी ने भिखारी ठाकुर को श्रद्धांजलि अर्पित की, जनसरोकारों से जुड़े लोक कलाकार की सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर पर विशेष स्मरण

भिखारी ठाकुर की विरासत को हिंदी–उर्दू अकादमी ने उनकी पुण्यतिथि पर स्मरण किया, लोक रंगमंच, सामाजिक सुधार और भारतीय सांस्कृतिक चेतना में उनके योगदान को रेखांकित किया।

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
Patna 18 दिसंबर 2025

विरासत के महत्व को रेखांकित करते हुए हिंदी–उर्दू अकादमी ने भोजपुरी के महान नाटककार, कवि, लोकगायक और सामाजिक चिंतक Bhikari Thakur की पुण्यतिथि श्रद्धा और गंभीर विमर्श के साथ मनाई। यह अवसर केवल श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके उस रचनात्मक योगदान पर पुनर्विचार का क्षण बना, जिसने भारतीय लोकसंस्कृति और जनमुखी रंगमंच को नई दिशा दी।

विरासत

अकादमी के संरक्षक एवं अध्यक्ष शमीम अहमद ने अपने संदेश में भिखारी ठाकुर की विरासत को आज के सामाजिक संदर्भों में भी उतना ही प्रासंगिक बताया। उन्होंने कहा कि भिखारी ठाकुर का साहित्य और रंगकर्म विस्थापन, अन्याय और मानवीय गरिमा जैसे बुनियादी सवालों से जुड़ा रहा—और यही कारण है कि उनका काम आज भी समाज से संवाद करता है।

मिट्टी से उपजा जनकलाकार

विरासत
भिखारी ठाकुर बिहार के ग्रामीण परिवेश से निकलकर भोजपुरी साहित्य और लोकनाट्य के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्व बने। उनकी रचनात्मक यात्रा किसी शास्त्रीय या अकादमिक परंपरा से नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों से उपजी थी। उनका रंगमंच गाँव के आँगनों, खुले मैदानों और आम लोगों के बीच पनपा—जहाँ कला मनोरंजन के साथ-साथ चेतना का माध्यम बनी।

“भोजपुरी का शेक्सपियर” कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर ने कथा, संगीत, नृत्य और संवाद को एक सशक्त लोकनाट्य परंपरा में ढाला। नाच रंगमंच की नींव रखने और स्त्री भूमिकाओं में पुरुष कलाकारों को मंच पर लाने की उनकी पहल ने रूढ़ सामाजिक सीमाओं को तोड़ा। यही समावेशी विरासत आगे चलकर लोक रंगमंच की पहचान बनी।

समाज से सवाल करती रचनाएँ

अकादमी की रिपोर्ट में भिखारी ठाकुर की प्रमुख कृतियों पर विस्तार से चर्चा की गई, जो आज भी सामाजिक रूप से उतनी ही प्रासंगिक हैं।बिदेसिया में उन्होंने रोज़गार की तलाश में होने वाले पलायन और पीछे छूट गई स्त्रियों के दर्द को स्वर दिया।बेटी बेचवा ने बाल विवाह और दहेज प्रथा की अमानवीय सच्चाइयों को बेनकाब किया।गबरघिचोर सामाजिक नैतिकता, वैधता और न्याय जैसे प्रश्नों को चुनौती देता है।उनके निर्गुण भजन जीवन की नश्वरता और आत्मिक चेतना की ओर संकेत करते हैं।

इन रचनाओं के माध्यम से भिखारी ठाकुर केवल कलाकार नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा बनकर सामने आते हैं।

आज के समय में प्रासंगिकता

हिंदी–उर्दू अकादमी ने रेखांकित किया कि जिन मुद्दों को भिखारी ठाकुर ने उठाया—पलायन, लैंगिक असमानता, सामाजिक पाखंड और आर्थिक शोषण—वे आज भी हमारे समय की सच्चाई हैं। तेज़ शहरीकरण और बदलते सामाजिक ढांचे के बीच उनका लोककला आधारित दृष्टिकोण आज भी उतना ही प्रभावी है।

सांझी सांस्कृतिक धरोहर

भोजपुरी भाषा में रचित होने के बावजूद भिखारी ठाकुर की रचनाएँ भाषा की सीमाओं से आगे जाती हैं। उनके विषय हिंदी, उर्दू और अन्य भारतीय लोक परंपराओं से गहरे जुड़े हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और महानगरों में बसे प्रवासी समुदायों के बीच आज भी उनका प्रभाव जीवित है।

शमीम अहमद के नेतृत्व में अकादमी ने यह संकल्प दोहराया कि भिखारी ठाकुर जैसी समावेशी सांस्कृतिक शख्सियतों पर शोध, अनुवाद, मंचन और शैक्षणिक विमर्श को प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी इस विरासत से जुड़ी रहे।

यह स्मरणोत्सव एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि उन विचारों से जुड़ने का प्रयास था जो नैतिक साहस और सामाजिक ज़िम्मेदारी की मांग करते हैं। लोकगीतों, मंचों और जनसंवाद में भिखारी ठाकुर की आवाज़ आज भी गूंज रही है।

भिखारी ठाकुर एक कलाकार से बढ़कर समाज के विवेक प्रहरी थे—जिन्होंने सिद्ध किया कि सच्चा साहित्य जीवन का केवल चित्रण नहीं करता, उसे चुनौती भी देता है।

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