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उर्दू का सन्नाटा टूटा, एक नई सहर की दस्तक: बारह वर्ष का वनवास और शमीम अहमद द्वारा उर्दू आंदोलन का पुनर्जागरण

उर्दू आंदोलन का संपूर्ण इतिहास, बंगाल में शमीम अहमद की भूमिका, मुस्लिम इंस्टीट्यूट हॉल की ऐतिहासिक सभा और बारह वर्षों बाद पुनर्जागरण की नई उम्मीद का विस्तृत विश्लेषण।

उर्दूएक लंबा सन्नाटा और नई सुबह की आहट

Qalam Times News Network
कोलकाता | 24 फरवरी 2026

बंगाल की कठोर राजनीतिक ज़मीन पर उर्दू के पौधे को सींचने और विकसित करने का इतिहास जितना लंबा है, उतना ही धैर्य की परीक्षा लेने वाला भी। इस आंदोलन के उतार-चढ़ाव पर नज़र डालें तो स्पष्ट होता है कि 1980 में जब पहली बार उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिलाने की मांग उठी, तब उस समय की नेतृत्वकारी संस्था—अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू के प्रभावशाली वर्ग और सरकार के बीच समझौतों का एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, जिसने तीन दशकों तक उर्दू भाषियों को केवल आश्वासन और सपने ही दिए।

तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु का यह कठोर रुख कि तीन प्रतिशत आबादी की भाषा किसी पर थोपी नहीं जाएगी, और इसके प्रत्युत्तर में प्रोफेसर हैदर हसन काज़मी की साहसी बहस—यह सब उर्दू के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय अवश्य है; लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इस पूरे संघर्ष का परिणाम कुछ चुनिंदा इलाकों तक सीमित एक निर्जीव अधिसूचना भर रहा।

बंगाल में उर्दू आंदोलन की कहानी त्याग और बलिदान के साथ-साथ समझौते और उपेक्षा के विरोधाभासी रंगों से बनी है। लंबे समय तक इस आंदोलन की बागडोर उर्दू अभिजात वर्ग के हाथों में रही, जिसने इसे सत्ता के केंद्र तक पहुँचाने के बजाय ड्राइंग रूम की बैठकों, निष्प्रभावी सेमिनारों और पारंपरिक मुशायरों की सीमाओं में कैद कर दिया।

जब सच्चा उर्दू प्रेमी वर्ग निराशा के गहरे अंधकार में भटक रहा था और प्रोफेसर हैदर हसन काज़मी की जनलहर को समझौतों की भेंट चढ़ाकर कुचल दिया गया था, तब लगभग 2005 के आसपास बंगाल के क्षितिज पर एक ऐसी शख्सियत उभरी, जिसने उर्दू आंदोलन का स्वभाव, दिशा और भविष्य ही बदल दिया। वह सम्मानित नाम शमीम अहमद का था, जिनका आगमन बंगाल के भाषाई इतिहास में एक युगांतकारी मील का पत्थर सिद्ध हुआ।

शमीम अहमद के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने उर्दू को केवल रोज़गार का साधन नहीं माना, बल्कि उसे मातृभाषाई पहचान और सामूहिक स्वाभिमान का प्रश्न बनाया। जिस समय उर्दू के स्वयंभू नेता सरकार की चापलूसी और खुशामद में लगे थे, उस समय शमीम अहमद ने गांधी प्रतिमा के साए तले जनस्तर पर इस आंदोलन की ऐतिहासिक शुरुआत की, जिसकी मिसाल बंगाल की धरती पर नहीं मिलती। यह आंदोलन कदम-दर-कदम कठिनाइयों से गुज़रा, लेकिन इसके संकल्प में कभी भी डगमगाहट नहीं आई।

उर्दू

इस आंदोलन का सबसे उज्ज्वल और जोश से भरा अध्याय मुस्लिम इंस्टीट्यूट हॉल का वह ऐतिहासिक कार्यक्रम था, जिसका मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। मैंने अपनी आँखों से वह दृश्य देखा, जो शायद ही उर्दू के इतिहास में कभी दोहराया गया हो। दिसंबर की कड़ाके की ठंड में सुबह नौ बजे से ही उर्दू के दीवाने जत्थों के रूप में मुस्लिम इंस्टीट्यूट पहुँचना शुरू हो गए थे, और शाम ढलते-ढलते वह जनसमूह एक अथाह सागर में बदल चुका था।

उर्दू

उस समय के उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी अख़बार इस बात के गवाह हैं—जिनकी तस्वीरें आज भी उस महान संघर्ष की याद दिलाती हैं—कि किसी ने 30 हज़ार तो किसी ने 40 हज़ार लोगों की उपस्थिति का उल्लेख किया। रफ़ी अहमद किदवई रोड का पूरा इलाका इंसानी सैलाब से भर गया था। लोग बिना खाए-पिए, सिर्फ़ अपनी भाषा की पुकार पर वहाँ पहुँचे थे।

यही वह जनशक्ति थी जिसने सरकार को झुकने पर मजबूर किया। विधानसभा में विधेयक पारित हुआ और राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद उर्दू को बंगाल में उसका संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुआ।

लेकिन बंगाल में उर्दू आंदोलन का दुखद पक्ष यह है कि यहाँ सफलता की मंज़िलें तो हासिल की गईं, पर उनकी रक्षा का भाव कमज़ोर पड़ गया। शमीम अहमद ने जिस जुनून और निष्ठा के साथ बिखरी कड़ियों को जोड़ा और विधानसभा से बिल पारित करवाने जैसी ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की, उसके बाद उनकी अचानक चुप्पी उर्दू के लिए घातक सिद्ध हुई।

उर्दू

अफसोस की बात यह है कि उनकी इस चुप्पी के कारणों पर न तो उर्दू के बुद्धिजीवियों ने गंभीरता से विचार किया और न ही आम लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर किन परिस्थितियों ने इतनी सशक्त आंदोलन की गति को थाम दिया।

आज का परिदृश्य हमारी सामूहिक उदासीनता की कहानी कहता है। अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस हो या कोई और भाषाई आयोजन, हम केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित होकर रह गए हैं। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि जिसने अपनी जान, माल और समय भाषा के नाम पर न्योछावर कर दिया, वह अचानक एकांत में क्यों चला गया।

उर्दू

यह एक कड़वी सच्चाई है कि जब कोई सच्चा नेता सब कुछ दांव पर लगाकर समाज की दिशा बदलने निकलता है और समाज उसे ही अनदेखा कर देता है, तो परिणाम वही होता है जो आज दिखाई दे रहा है। उर्दू समाज का एक बड़ा हिस्सा सच्चे नेतृत्व को छोड़कर दिखावे, तात्कालिक लाभ और समझौतापरस्त नेताओं के पीछे चल पड़ा। नतीजा यह हुआ कि उर्दू का सम्मान हमारी आँखों के सामने धीरे-धीरे क्षीण होता जा रहा है।

यदि समाज का रवैया यही बना रहा, तो भविष्य में कोई भी सच्चा और समर्पित व्यक्ति महीनों और वर्षों तक अपनी ऊर्जा और क्षमता समाज के लिए लगाने का साहस नहीं करेगा। जब कोई समुदाय अपने वास्तविक हितैषियों को पहचानने की क्षमता खो देता है, तो आंदोलनों की धारा सूख जाती है। उर्दू की वर्तमान दयनीय स्थिति उसी वैचारिक बेवफाई का परिणाम है, जिसने एक जीवंत मिशन को ठहराव में बदल दिया।

वर्तमान परिदृश्य: एक सामूहिक उदासीनता

आज जब हम बंगाल में उर्दू की मौजूदा हालत का आकलन करते हैं, तो मन व्यथित हो उठता है। क़ानून बन जाने और विधानसभा में विधेयक पारित हो जाने के बावजूद उर्दू की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। उर्दू स्कूलों की वीरानी, शिक्षकों की कमी, सरकारी दफ्तरों में उर्दू आवेदनों की अनदेखी और नई पीढ़ी का अपनी भाषा से बढ़ता हुआ दूरी बना लेना—ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि जो अधिकार वर्षों के संघर्ष के बाद कागज़ों पर मिले थे, वे व्यवहार में लागू नहीं हो सके।

आज की उर्दू अभिजात वर्ग फिर से निष्क्रियता की स्थिति में है, और सामान्य उर्दू भाषी समाज नेतृत्व के अभाव में उदासीनता का शिकार हो चुका है।

इन्हीं अंधकारमय क्षणों में यह भावना तीव्र हो उठती है कि शमीम अहमद के नेतृत्व में चला उर्दू आंदोलन एक बार फिर नए सिरे से शुरू किया जाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। बंगाल को आज फिर उसी जुनून, उसी निष्ठा और उसी अडिग नेतृत्व की आवश्यकता है, जिसने 2009 में मुस्लिम इंस्टीट्यूट हॉल के ऐतिहासिक जनसमूह को जन्म दिया था, जहाँ हजारों लोग अपने अधिकारों के लिए दिनभर भूखे-प्यासे डटे रहे थे।

शमीम अहमद की चुप्पी से जो शून्य उत्पन्न हुआ है, उसे समझौतापरस्त राजनीति से नहीं भरा जा सकता। उसे केवल उसी क्रांतिकारी भावना से भरा जा सकता है, जो घरों से निकलकर सड़कों पर अपने अधिकारों की आवाज़ बुलंद करना जानती हो।

उर्दू की बेहतरी के लिए अब केवल सेमिनार और प्रस्ताव पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता इस बात की है कि शमीम अहमद की उस कार्यशैली को फिर से जीवित किया जाए, जिसमें जनजागरण और संवैधानिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए समर्पित भाव से मैदान में उतरना पड़ता है। यदि आज फिर से वह आंदोलन संगठित नहीं हुआ, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें इस भाषाई और सांस्कृतिक आत्मघात के लिए ज़िम्मेदार ठहराएँगी।

समय बार-बार संकेत दे रहा है कि उर्दू का सम्मान तभी पुनर्स्थापित हो सकता है, जब शमीम अहमद जैसा कोई सच्चा और निष्ठावान नेता पुनः इस कारवाँ की बागडोर संभाले और उर्दू भाषियों को उनकी मातृभाषा का वह अधिकार दिलाए, जो क़ानून की पुस्तकों में तो दर्ज है, पर जनजीवन से अनुपस्थित है।

बारह वर्षों बाद उम्मीद की लौ

हालाँकि निराशा के इस घने अंधकार में हाल ही में एक आशा की किरण दिखाई दी है। बारह वर्षों के बाद शमीम अहमद का सार्वजनिक रूप से दिया गया साक्षात्कार किसी चमत्कार से कम नहीं है। इंसाफ़ न्यूज़ के माध्यम से सामने आई उनकी बातचीत ने उर्दू के सच्चे प्रेमियों के हृदय में फिर वही बेचैनी और उत्साह जगा दिया है।

उर्दू

बारह वर्ष की लंबी चुप्पी के बाद उनकी आवाज़ का पुनः गूंजना इस बात का संकेत है कि राख के नीचे चिंगारी अब भी जीवित है। यह साक्षात्कार मात्र एक संवाद नहीं, बल्कि उन सभी प्रश्नों का उत्तर और एक नई चेतना का आरंभ है, जिनकी प्रतीक्षा उर्दू समाज लंबे समय से कर रहा था।

बारह वर्ष बाद दिए गए इस एक साक्षात्कार ने जो आशा की किरण फिर से प्रज्वलित की है, उसकी कद्र करना हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। अब उर्दू समुदाय का दायित्व है कि वह उदासीनता की जड़ता को तोड़कर आगे आए। यदि अब भी हम जागृत न हुए और शमीम अहमद जैसी सच्ची नेतृत्वकारी शक्ति के पीछे एकजुट न हुए, तो इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा।

उर्दू की बेहतरी और उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए इस आंदोलन का पुनरुत्थान अनिवार्य है, ताकि जो अधिकार कागज़ों पर प्राप्त हुए थे, वे धरातल पर भी लागू हो सकें।

 

 

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