यूएनआई संकट की पूरी कहानी, कॉरपोरेट विवाद, सरकारी फैसलों और आर्थिक गिरावट से कैसे प्रभावित हुई देश की प्रमुख समाचार एजेंसी।
Qalam Times News Network
नई दिल्ली | 23 मार्च 2026
यूएनआई संकट आज अचानक पैदा हुई स्थिति नहीं है, बल्कि यह कई दशकों से चले आ रहे फैसलों, विवादों और उपेक्षा का नतीजा है। देश की प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया (UNI) लगातार आर्थिक और प्रशासनिक दबावों के बीच कमजोर होती चली गई। हालात अब ऐसे हो गए हैं कि संस्था का अस्तित्व ही संकट में नजर आ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत उस समय मानी जाती है जब संयुक्त मोर्चा सरकार के दौरान एजेंसी को बेहद कम कीमत पर एक निजी मीडिया समूह को सौंप दिया गया। बताया जाता है कि इस सौदे में नियमों की अनदेखी हुई और जमीन व संपत्तियों के कारण कॉरपोरेट रुचि बढ़ी। इसी मोड़ से यूएनआई संकट ने गहराना शुरू किया और एजेंसी की वित्तीय स्थिति लगातार बिगड़ती चली गई।
यूएनआई के शेयरों को लेकर विवाद भी इस संकट की अहम कड़ी रहा। एक प्रमुख मीडिया समूह ने इस सौदे को कंपनी लॉ बोर्ड में चुनौती दी, जहां फैसला उसके पक्ष में गया और शेयर खरीद को अवैध ठहराया गया। इसके बाद समझौते के तहत निवेश वापस लिया गया, जिससे एजेंसी की जमा पूंजी पर असर पड़ा और आर्थिक संकट और गहरा गया।
बाद के वर्षों में जब मामला केंद्र सरकार के सामने उठा, तब भी ठोस हस्तक्षेप नहीं हुआ। वरिष्ठ स्तर पर मुलाकातों के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया। इस बीच एजेंसी के निदेशक मंडल में भी बदलाव हुए और कई बड़े मीडिया संस्थानों ने दूरी बना ली।
परिणामस्वरूप कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिलने लगा, लेकिन इसके बावजूद पत्रकार काम करते रहे। कई वर्षों तक आंदोलन और विरोध के बावजूद स्थिति में खास सुधार नहीं आया। हालात तब और गंभीर हो गए जब सरकारी प्रसारक ने एजेंसी की सेवाएं लेना बंद कर दिया। इससे मिलने वाली नियमित आय रुक गई। साथ ही उर्दू सेवा के लिए मिलने वाली वित्तीय सहायता भी बंद कर दी गई। इसके विपरीत अन्य एजेंसियों को समर्थन मिलने से असंतुलन की स्थिति पैदा हुई। इसके बाद एजेंसी को अपने दफ्तर को खाली करने का नोटिस भी मिला, जिसने संकट को और गहरा कर दिया।
हाई कोर्ट के फैसलों और कंपनी लॉ बोर्ड की प्रक्रिया को लेकर भी विवाद सामने आए। अदालत ने एजेंसी के स्वरूप में बदलाव को लेकर अलग राय दी, जबकि इससे जुड़े कानूनी पहलुओं को लेकर कई सवाल उठे। इसके अलावा कर्मचारियों के बकाया भुगतान को लेकर लेबर कोर्ट के आदेश भी पूरी तरह लागू नहीं हो सके, जिससे न्यायिक प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हुए। आज स्थिति यह है कि करीब 250 कर्मचारियों का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। कई लोग वर्षों तक बिना वेतन के काम करते रहे और एजेंसी को किसी तरह जिंदा रखा। इसके बावजूद संस्था अब भी पूरी तरह स्थिर नहीं हो पाई है।
यूएनआई का मामला केवल एक संस्था का संकट नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे नीतिगत फैसलों, कॉरपोरेट हस्तक्षेप और सरकारी उदासीनता मिलकर किसी मजबूत संस्थान को कमजोर कर सकते हैं।






