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डेटा निजता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश: भारत में रहना है तो कानून मानना होगा

डेटा निजता पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मेटा–वॉट्सऐप को भारतीय कानून मानने के सख्त निर्देश, जानिए आम लोगों पर इसका असर।

डेटा निजता : मेटा–वॉट्सऐप नीति पर कोर्ट सख्त, नागरिकों के अधिकार सर्वोपरि

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क | विशेष रिपोर्ट

नई दिल्ली | 4 फ़रवरी 2026

डेटा निजता को लेकर सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला देश के हर मोबाइल और इंटरनेट उपयोगकर्ता के लिए बेहद अहम है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि भारत में कारोबार करने वाली किसी भी विदेशी कंपनी को यहाँ के कानून और संविधान का पूरी तरह पालन करना होगा—चाहे वह कितनी ही बड़ी टेक कंपनी क्यों न हो।

यह मामला मेटा (फेसबुक और वॉट्सऐप की मूल कंपनी) की उस नीति से जुड़ा है, जिसके तहत वह यूज़र्स के डेटा को अपने अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स के बीच साझा करना चाहती है। अदालत का मानना है कि डेटा निजता कोई व्यावसायिक सौदा नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।

वॉट्सऐप और मेटा की कोशिश थी कि यूज़र की बातचीत, पसंद-नापसंद और डिजिटल व्यवहार से जुड़ी जानकारी आपस में साझा की जाए, ताकि विज्ञापनों से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाया जा सके। लेकिन भारतीय कानून स्पष्ट है—किसी भी व्यक्ति की निजी जानकारी उसकी अनुमति के बिना साझा नहीं की जा सकती।

दूसरे शब्दों में, डेटा निजता पर अंतिम अधिकार यूज़र का है, न कि किसी कंपनी का।

सुप्रीम कोर्ट की तीन सबसे अहम टिप्पणियाँ

  1. निजता कोई समझौता नहीं
    कोर्ट ने दो टूक कहा कि निजी जानकारी को व्यापार का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता। यह अधिकार संविधान से मिला है और इससे कोई समझौता नहीं होगा।
  2. भारतीय कानून सर्वोच्च है
    मुख्य न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा कि कोई भी विदेशी कंपनी यह तर्क नहीं दे सकती कि उसकी “ग्लोबल पॉलिसी” भारतीय कानून से ऊपर है। भारत में व्यापार करना है, तो भारत के नियम मानने ही होंगे।
  3. विकल्प खुला है, दबाव नहीं
    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी कंपनी को भारत के प्राइवेसी नियम स्वीकार नहीं हैं, तो वह यहाँ अपना कारोबार बंद करने के लिए स्वतंत्र है। नागरिकों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा।

आम लोगों के लिए इस फैसले का क्या मतलब है

  • डेटा की बेहतर सुरक्षा
    अब कंपनियाँ बिना अनुमति यूज़र डेटा को एक प्लेटफॉर्म से दूसरे प्लेटफॉर्म पर ट्रांसफर नहीं कर सकेंगी।
  • टार्गेटेड विज्ञापनों पर असर
    जब डेटा शेयरिंग सीमित होगी, तो व्यक्तिगत बातचीत और रुचियों के आधार पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों में भी कमी आएगी।
  • भविष्य के लिए मिसाल
    यह फैसला आने वाले समय में सभी ‘बिग टेक’ कंपनियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है—कानून से ऊपर कोई नहीं।

सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सिर्फ एक कंपनी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि डिजिटल दौर में नागरिकों के अधिकारों की मज़बूत रक्षा की दिशा में बड़ा कदम है। डेटा निजता अब सिर्फ एक तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि कानूनी हक़ के तौर पर स्थापित हो चुकी है।

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