सामाजिक संतुलन के साथ तृणमूल की उम्मीदवार सूची, SC/ST और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का विश्लेषण।
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली | 17 मार्च 2026
सामाजिक संतुलन इस बार पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस की रणनीति का सबसे प्रमुख आधार बनकर उभरा है। पार्टी की जारी उम्मीदवार सूची से साफ संकेत मिलता है कि उसने केवल चुनाव जीतने की तैयारी नहीं की, बल्कि सामाजिक वर्गों के बीच अपनी पकड़ को मजबूत करने की कोशिश भी की है। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक समुदाय—तीनों को ध्यान में रखते हुए टिकट वितरण किया गया है।

राज्य में कुल 294 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 84 सीटें SC और ST के लिए आरक्षित हैं। लेकिन तृणमूल ने इस दायरे से आगे बढ़ते हुए कुल 95 उम्मीदवार इन वर्गों से उतारे हैं। यानी सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए 11 उम्मीदवारों को सामान्य सीटों पर भी मौका दिया गया है। यह कदम केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
आंकड़ों में तृणमूल की रणनीति
- कुल सीटें: 294
- तृणमूल के उम्मीदवार: 291
- SC/ST उम्मीदवार: 95
- आरक्षित सीटें: 84
- सामान्य सीटों पर SC/ST उम्मीदवार: 11
- अल्पसंख्यक उम्मीदवार: 47
पिछले कुछ वर्षों में एससी और एसटी बहुल इलाकों में भाजपा का प्रभाव बढ़ा था, खासकर 2019 लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनाव में। उत्तर बंगाल, जंगलमहल और मतुआ समुदाय वाले क्षेत्रों में तृणमूल को चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।
इसी पृष्ठभूमि में पार्टी ने इस बार इन वर्गों पर विशेष ध्यान दिया है। मार्च की शुरुआत में आयोजित ‘तफसीली संवाद’ कार्यक्रम और विभिन्न समुदायों के लिए विकास बोर्ड बनाने की घोषणा इसी दिशा में उठाए गए कदम माने जा रहे हैं।
उत्तर बंगाल के राजबंशी समुदाय से लेकर पश्चिमी जिलों के आदिवासी इलाकों तक, तृणमूल ने व्यापक पहुंच बनाने की कोशिश की है। नीले और पीले रंग के प्रचार अभियान के जरिए एक सांकेतिक संदेश भी दिया गया—जहां नीला रंग डॉ. भीमराव अंबेडकर से जुड़ा है, वहीं पीला रंग राजबंशी समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है।
हुगली, बांकुड़ा, पुरुलिया, झाड़ग्राम और पश्चिम मिदनापुर जैसे क्षेत्रों में भी पार्टी ने खास रणनीति अपनाई है, जहां आदिवासी और दलित मतदाता बड़ी संख्या में हैं।
अल्पसंख्यक कार्ड भी मजबूत
इस चुनाव में तृणमूल ने 47 अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को टिकट दिया है। 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 27% है और करीब 75 सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। यही वजह है कि पार्टी ने इस वर्ग को भी संतुलित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा की पहली सूची में एक भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार को जगह नहीं मिली, जिसे तृणमूल चुनावी मुद्दा बना सकती है। तृणमूल कांग्रेस की यह सूची साफ तौर पर दिखाती है कि चुनाव अब केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों का खेल भी है। सामाजिक संतुलन को केंद्र में रखकर बनाई गई यह रणनीति यह संकेत देती है कि पार्टी हर वर्ग को साथ लेकर चुनावी मैदान में उतरना चाहती है। अब नजर इस बात पर होगी कि क्या यह संतुलन वोट में बदल पाता है या नहीं।






