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 न्याय पर सवाल: उन्नाव की बेटी और इंसाफ़ की टूटती उम्मीद

न्याय के नाम पर उन्नाव कांड में दोषी को ज़मानत मिलने से पीड़ित परिवार में दहशत। क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क की विशेष रिपोर्ट पढ़ें।

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
New Delhi 24
दिसंबर 2025

न्याय:उन्नाव कांड में दोषी को ज़मानत, पीड़ित परिवार के लिए फिर लौटा डर का साया

न्याय एक ऐसा शब्द है जो क़ानून की किताबों में तो मज़बूत दिखता है, लेकिन उन्नाव की उस बेटी के लिए यह आज भी एक अधूरा सपना बना हुआ है। जिस मामले ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था, वही उन्नाव बलात्कार कांड एक बार फिर सवालों के घेरे में है। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा उम्रकैद की सज़ा काट रहे पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को ज़मानत दिए जाने का फ़ैसला, पीड़ित परिवार के लिए राहत नहीं बल्कि नए ख़ौफ़ का पैग़ाम बनकर आया है۔ आठ साल से इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहा यह परिवार आज फिर असुरक्षा और अनिश्चितता के बीच खड़ा है।

न्याय

इस दर्दनाक कहानी की शुरुआत जून 2017 में हुई थी, जब उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले में एक नाबालिग लड़की को सत्ता के नशे में चूर एक प्रभावशाली नेता ने अपनी हवस का शिकार बनाया। महीनों तक सिस्टम ने चुप्पी साधे रखी। जब पीड़िता के पिता ने आवाज़ उठाई, तो उन्हें झूठे मामले में जेल भेज दिया गया, जहाँ हिरासत में उनकी मौत हो गई। न्याय की मांग करने की कीमत यहीं खत्म नहीं हुई। जुलाई 2019 में रायबरेली के पास हुए रहस्यमय सड़क हादसे में पीड़िता की दो चाचियों की जान चली गई और वह खुद गंभीर रूप से घायल हो गई। बाद में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से मुकदमा दिल्ली स्थानांतरित हुआ और ट्रायल कोर्ट ने दिसंबर 2019 में दोषी को उम्रकैद और जुर्माने की सज़ा सुनाई।

अब उसी दोषी को 15 लाख रुपये के मुचलके पर ज़मानत मिलना कई सवाल खड़े करता है। अदालत की यह शर्त कि आरोपी पीड़िता के घर से पाँच किलोमीटर दूर रहेगा, ज़मीनी हकीकत से परे लगती है। जिस व्यक्ति पर सत्ता, पैसा और तंत्र को अपने इशारों पर चलाने के आरोप साबित हो चुके हों, उसके लिए दूरी महज़ एक औपचारिकता बनकर रह जाती है। इससे भी गंभीर सवाल यह है कि ज़मानत से ठीक पहले पीड़ित परिवार की सुरक्षा क्यों हटाई गई? क्या यह सब आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले किसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है?

आज दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन करती वह मां और बेटी सिर्फ़ एक व्यक्ति के ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से सवाल कर रही हैं जहाँ न्याय अक्सर ताक़तवरों की सुविधा बन जाता है। अब उम्मीदों की आख़िरी किरण सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है। अगर वहाँ से भी राहत नहीं मिली, तो यह सिर्फ़ उन्नाव की बेटी की हार नहीं होगी, बल्कि हर उस बेटी का भरोसा टूटेगा जो अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े होने का साहस करती है।

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