मुकुल रॉय का 73 वर्ष की आयु में कोलकाता में निधन। तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकार और पूर्व रेल मंत्री रहे मुकुल रॉय के राजनीतिक सफर, भाजपा में जाने और वापसी की पूरी कहानी पढ़ें।
संगठन के माहिर रणनीतिकार मुकुल रॉय , कभी सत्ता के शिखर पर तो कभी हाशिये पर रहे वरिष्ठ नेता
Qalam Times News Network
कोलकाता | 23 फरवरी 2026

मुकुल रॉय का रविवार को कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे 71 वर्ष के थे और लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। पिछले कुछ वर्षों में उनका जीवन घर और अस्पताल तक सिमट कर रह गया था। स्वास्थ्य लगातार गिरता गया और अंततः उन्होंने अंतिम सांस ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में उन्हें एक ऐसे रणनीतिकार के रूप में याद किया जाएगा, जिसने संगठन खड़ा करने की कला को नई पहचान दी।
राजनीतिक गलियारों में मुकुल रॉय को कभी “बंगाल का चाणक्य” कहा जाता था। तृणमूल कांग्रेस में वे उस दौर में दूसरे नंबर की हैसियत रखते थे, जब ममता बनर्जी पार्टी और सरकार दोनों की अगुवाई कर रही थीं। संगठन को विस्तार देने, दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने और चुनावी रणनीति बनाने में उनकी गहरी पकड़ थी। 2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद पार्टी की लगातार सफलताओं ने उनके कद को और ऊँचा कर दिया।
राजनीति और क्रिकेट: दो जुनून
करीबी लोगों के मुताबिक कॉलेज के दिनों से ही उनकी रुचि दो ही चीज़ों में थी—राजनीति और क्रिकेट। खास तौर पर टेस्ट मैच उन्हें बेहद पसंद थे। व्यस्ततम राजनीतिक कार्यक्रम के बावजूद वे कोलकाता के ईडन गार्डन्स में टेस्ट मैच देखने का समय निकाल लेते थे। राजनीति में भी वे धैर्य और लंबी रणनीति के पक्षधर माने जाते थे—कुछ वैसा ही जैसे पांच दिन के टेस्ट मैच की बारीकियां।
फ़र्श से अर्श तक और फिर उतार

70 के दशक में वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई से जुड़े, फिर कांग्रेस में आए। लेकिन असली मोड़ तब आया जब उनकी मुलाकात ममता बनर्जी से हुई। 1990 के दशक में ममता के साथ खड़े होकर उन्होंने नई राजनीतिक राह चुनी। 1998 में तृणमूल कांग्रेस के गठन में उनकी भूमिका निर्णायक रही और वे पार्टी के पहले राष्ट्रीय महासचिव बने।
2009 में केंद्र की यूपीए सरकार में वे जहाजरानी राज्य मंत्री बने। 2012 में दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे के बाद उन्हें रेल मंत्री बनाया गया। हालांकि यह कार्यकाल लंबा नहीं चला। बाद में पार्टी और नेतृत्व के साथ मतभेद बढ़ने लगे। 2014 के बाद पार्टी में नई पीढ़ी के उभार और आंतरिक खींचतान ने उनके प्रभाव को कम किया।
भाजपा की ओर रुख और वापसी

अक्टूबर 2017 में राज्यसभा से इस्तीफा देकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा की बढ़त का श्रेय काफी हद तक उन्हें दिया गया। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर जीतने के कुछ समय बाद ही वे फिर तृणमूल कांग्रेस में लौट आए।
उनकी वापसी के बाद दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता को लेकर मामला अदालत पहुंचा। कलकत्ता हाईकोर्ट ने विधायक पद रद्द करने का निर्देश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस पर अंतरिम रोक लगा दी। मामला लंबित ही रहा।
निजी जीवन के झटके और अंत का दौर

पत्नी कृष्णा रॉय के निधन ने उन्हें गहरा आघात पहुंचाया। करीबी बताते हैं कि उसके बाद वे भीतर से टूट गए थे। स्वास्थ्य समस्याएं और मानसिक अवसाद ने उन्हें सक्रिय राजनीति से दूर कर दिया। आख़िरी वर्षों में वे सार्वजनिक जीवन से लगभग गायब हो गए थे।
विश्लेषकों का मानना है कि सारदा और नारदा जैसे विवादों के बाद से उनके और ममता बनर्जी के संबंधों में दूरी बढ़ी, जो कभी पूरी तरह पाटी नहीं जा सकी।
फिर भी यह सच है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को जमीनी स्तर से खड़ा करने और उसे सत्ता तक पहुंचाने में मुकुल रॉय की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता।






