कायद-ए-उर्दू शमीम अहमद ने विश्व मातृभाषा दिवस 2026 पर पश्चिम बंगाल में उर्दू की वर्तमान स्थिति और उर्दू अकादमी की विफलताओं पर अपनी बेबाक राय साझा की है।
माँ की ज़ुबान पर मौत का सन्नाटा: क्यों खामोश है उर्दू अकादमी?
स्कूल बे-उस्ताद, अकादमी बे-हिस: किस मुँह से मनाओगे ‘मातृभाषा दिवस‘?
कहते हैं, इंसान की पहचान उसकी माँ की गोद में बनती है और उसकी ज़ुबान उसकी माँ ही तय करती है। वह ज़ुबान, जो बचपन की पहली आवाज़ होती है, जिसमें माँ प्यार से नाम लेती है, वही हमारी ‘मातृभाषा’ है। यह सिर्फ बोलने का ज़रिया नहीं, बल्कि हमारे वजूद की नींव है, हमारी तहज़ीब की तस्वीर है और हमारे ख़यालों की सबसे सच्ची तर्जुमान। यही वह धरोहर है जो हमें अपने बुज़ुर्गों से मिली और यही हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इसे आने वाली नस्लों तक पहुँचाएँ। जब हम अपनी मातृभाषा में बात करते हैं, तो दिल के सबसे गहरे जज़्बात भी बयान हो जाते हैं। यही वजह है कि पूरी दुनिया में 21 फरवरी का दिन ‘विश्व मातृभाषा दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है, ताकि हर इंसान अपनी जड़ों से जुड़ा रहे और अपनी भाषा की मिठास को कभी न भूले।
इस खास मौके पर हम बात कर रहे हैं पश्चिम बंगाल के एक ऐसे शख्स की, जिसने अपनी मातृभाषा उर्दू के लिए न सिर्फ आवाज़ उठाई, बल्कि एक पूरी तहरीक को अपने कंधों पर ढोया। यह शख्सियत हैं शमीम अहमद, जिन्हें उर्दू वाले प्यार से ‘क़ायदे-उर्दू’ कहते हैं। उर्दू के इस आम आदमी ने बताया कि अगर जज़्बा हो तो एक इंसान क्या कर सकता है।
कैसे एक आदमी ने बदल दी बंगाल की तस्वीर?

बात उन दिनों की है जब पश्चिम बंगाल की करीब एक करोड़ उर्दू आबादी सिर्फ अपनी भाषा को हक दिलाने के लिए तरस रही थी। अंजुमन तरक्की उर्दू और सरकार के बीच आँख-मिचौली जारी थी। वादे किए जाते, फिर मुकर जाया जाता। इसी बीच शमीम अहमद नाम के एक शख्स ने ठान लिया कि बस अब बहुत हुआ।
शमीम अहमद ने खुद अपनी ज़ुबानी बताया, “मैं उर्दू का प्रोफेसर नहीं था, न कोई बड़ा अदीब या शायर था। मैं तो बस एक आम आदमी था, जो रोज़ की तरह दिल्ली से कोलकाता आया था। एक दोस्त ने धर्मतला में हो रहे उर्दू कॉन्फ्रेंस में चलने को कहा। मैं एक सामान्य श्रोता की तरह वहाँ पहुँच गया। वहाँ एलान हुआ कि सरकार उर्दू को दूसरी सरकारी ज़ुबान बनाने को राज़ी है। मैं भी दूसरों की तरह खुश हो गया और अखबारों में बधाइयाँ दीं। लेकिन कुछ दिनों बाद पता चला कि यह सब झूठ था, सरकार ने साफ मना कर दिया।”
“उस दिन मैं समझ गया कि यह कोई खेल नहीं, बल्कि एक साजिश है। हमारी भाषा के साथ सिर्फ धोखा हो रहा है। गुस्सा भी था और दर्द भी। मैंने तय किया कि अब किसी के पीछे भागना नहीं है, बल्कि अपनी मेहनत से एक नई शुरुआत करनी है।”
यह वो दौर था जब वाम मोर्चा की सरकार अपने चरम पर थी। 2006 में उसे शानदार जीत मिली थी। ऐसे में सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाना आसान नहीं था। शमीम अहमद के अपने लोग भी उन्हें समझाते थे, डराते थे, लेकिन वह डटे रहे। उनका कहना था, “मुझे यकीन था कि अगर खुदा ने मेरे दिल में यह जज़्बा डाला है, तो वही मेरी मदद करेगा।”
जंतर-मंतर से लेकर विधानसभा तक का सफर
शमीम अहमद ने अकेले ही यह मुहिम छेड़ दी। गाँव-गाँव, शहर-शहर लोगों से मिले। 2012 में कोलकाता के मेट्रो चैनल पर हजारों लोगों का जमावड़ा हुआ। फिर यह आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर तक जा पहुँचा। लोगों का जोश देखते ही बनता था।
आखिरकार यह आंदोलन रंग लाया। बंगाल विधानसभा में उर्दू को दूसरी राजभाषा बनाने का बिल पास हुआ। लेकिन यहीं कहानी खत्म नहीं हुई। बिल पास होने के बाद भी नौ महीने तक राज्यपाल के हस्ताक्षर का इंतजार रहा। फिर से आंदोलन हुए, नादिर शाह के मकबरे के सामने प्रदर्शन हुए। आखिरकार, वह दिन आया जब राज्यपाल ने दस्तखत किए और उर्दू को उसका हक मिल गया। उस दिन शमीम अहमद ने एलान किया, “मेरा मकसद पूरा हो गया। अब उर्दू की तरक्की की जिम्मेदारी उन लोगों पर है, जो इस भाषा में पढ़े-लिखे हैं, जो लाखों कमा रहे हैं, जो शायर और अदीब हैं।”
मौजूदा हालात : क्या सिर्फ जश्न ही बाकी है?
अब सवाल यह है कि इन 12-14 सालों में क्या बदला? क्या उर्दू सच में तरक्की कर पाई? विश्व मातृभाषा दिवस पर शमीम अहमद ने एक बार फिर दर्द भरी आवाज़ में कहा, “हालात पहले से भी बदतर हैं।”
वह बताते हैं, “जब लेफ्ट सरकार थी, तब उर्दू को सरकारी दर्जा नहीं था, लेकिन स्कूलों में उस्ताद थे, पढ़ाई का माहौल था। आज सरकारी दर्जा मिलने के बाद भी उर्दू स्कूल उस्तादों से खाली हो चुके हैं। हज़ारों पद खाली हैं, लेकिन भरती नहीं हो रही।”
उर्दू अकादमी पर उठाए गए सवाल:

शमीम अहमद ने उर्दू अकादमी के कामकाज पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि पहले जो चेयरमैन हुआ करते थे, वे उर्दू के बड़े नाम होते थे, जिन्हें भाषा की बारीकियों का पूरा इल्म था। लेकिन आज अकादमी में ऐसे लोगों को बैठा दिया गया है, जिनका उर्दू से दूर-दूर तक वास्ता नहीं।
वह कहते हैं, “भला बताइए, क्या बांग्ला अकादमी में किसी ऐसे शख्स को जगह मिल सकती है जो बांग्ला नहीं जानता? फिर उर्दू अकादमी के साथ यह अन्याय क्यों? यहाँ चप्पल बनाने वाले से लेकर ठेकेदार तक सब बैठ गए हैं। यह सिर्फ सरकारी फंड की बर्बादी है।”
क्या है अकादमी की जिम्मेदारी?

उनके मुताबिक, अकादमी का काम सिर्फ मुशायरे और कव्वालियाँ कराना नहीं है। उसकी असली जिम्मेदारी है कि वह सरकार को बताए कि कहाँ टीचर की कमी है, किस स्कूल में बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं। अगर अकादमी सिर्फ पाँच-छह चेहरों के सहारे चलती रहेगी, तो उर्दू की असली तरक्की कैसे होगी?
शमीम अहमद ने सीधे तौर पर मौजूदा चेयरमैन नदीमुल हक से अपील की है, “अगर आपको अपनी ज़बान से मोहब्बत है, तो इस कुर्सी से इस्तीफा दे दीजिए। क्योंकि इस कुर्सी पर वही बैठ सकता है, जो उर्दू को समझता हो, जिसने उर्दू में तालीम हासिल की हो। आप पढ़े-लिखे हैं, लेकिन उर्दू अकादमी के लिए सिर्फ पढ़ा-लिखा होना काफी नहीं है।”
उनका साफ कहना है कि जब तक स्कूलों में उस्ताद नहीं आएंगे, बच्चों को किताबें नहीं मिलेंगी, तब तक ये चकाचौंध भरे प्रोग्राम उर्दू को नहीं बचा सकते।
शमीम अहमद का दर्द साफ झलकता है। वह एक ऐसे आदमी हैं, जिन्होंने बिना किसी ओहदे के, सिर्फ अपने दम पर एक भाषा को उसका हक दिलाया। आज जब वह देखते हैं कि वही भाषा फिर से उपेक्षित हो रही है, तो उनका दिल टूट जाता है।
इस विश्व मातृभाषा दिवस पर उनका संदेश साफ है, “हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम अपनी भाषा को सिर्फ जश्नों का विषय न बनाएँ, बल्कि उसे स्कूलों, कॉलेजों और गलियों तक में जिंदा रखें। अपनी मातृभाषा से प्यार करें, उसे पढ़ें और अपने बच्चों को भी पढ़ाएँ। क्योंकि माँ की ज़ुबान ही हमारी असली पहचान है।”
तो आइए, इस दिन हम सब यह संकल्प लें कि चाहे हम कितनी भी भाषाएँ सीख लें, अपनी मातृभाषा को कभी नहीं भूलेंगे और उसे आने वाली नस्लों तक पहुँचाने की कोशिश करते रहेंगे। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उन लाखों लोगों को, जिन्होंने भाषा के लिए कुर्बानियाँ दीं।
बहुत-बहुत मुबारक हो आपको ‘विश्व मातृभाषा दिवस’ की। अपनी ज़बान पर नाज़ कीजिए, उसे सलाम कीजिए!






