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मताधिकार: लोकतंत्र की लौ बुझाने की साज़िश

मताधिकार पर मंडराते खतरे के बीच 12 राज्यों में SIR प्रक्रिया की अव्यवस्थाओं, राजनीतिक हस्तक्षेप और लाखों वोटरों के नाम हटाने की आशंकाओं पर विस्तृत रिपोर्ट।

By Qalam Times News Network
नई दिल्ली, 30 November 2025

चुनावी सूचियों की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया ने बढ़ाई आशंकाएँ, लोकतांत्रिक अधिकार पर मंडराया खतरा

मताधिकार सिर्फ़ एक संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन देश की 12 राज्यों में चल रही चुनावी सूचियों की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया (SIR) ने इसी मताधिकार पर एक गंभीर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जिस तरह इस प्रक्रिया ने बेचैनी, डर और भ्रम का माहौल पैदा किया है, वह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए चिंताजनक है। गहराई से देखें तो यह सिर्फ़ तकनीकी अभ्यास नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसमें चुनाव आयोग धीरे-धीरे सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के इशारों पर काम करने वाले उपकरण जैसा दिखने लगा है।

यहाँ ज़रूरी है समझना कि SIR की शुरुआत से ही यह प्रक्रिया जल्दबाज़ी और लापरवाही का शिकार रही। तैयारी अधूरी थी, ज़मीनी अमला—खासकर BLOs—को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं मिला। मताधिकार से जुड़े इतने अहम काम में सर्वर की ख़राबी, ऊपर से दबाव, और फील्ड में फैली अफरा-तफ़री ने हालात को और बदतर कर दिया। कई जगह तो काम का बोझ और डर इस कदर बढ़ा कि मौतों की ख़बरें भी सामने आईं। एक ऐसी प्रक्रिया जिसका मकसद लोगों के अधिकार की रक्षा हो, वही लोगों की परेशानी बन जाए—यह चुनाव आयोग की संवेदनहीनता की हद है।

अब सवाल उठता है कि जब कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में महीनों बाकी हैं—खासतौर पर पश्चिम बंगाल में लगभग छह महीने—तो इतनी हड़बड़ी क्यों? वाम दलों का कहना है कि मृत मतदाताओं के नामों को पहले ही हटाया जा सकता था, जिससे SIR पर दबाव कम होता और लाखों फ़ॉर्म बाँटने की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन आयोग ने अपनी यह ज़िम्मेदारी निभाने के बजाय लगातार दस्तावेज़ माँगकर खासकर गरीब और पिछड़े तबकों को मुश्किल में डाल दिया, जिनके पास पूरी काग़ज़ी फाइलें अक्सर होती ही नहींं या उनके सरकारी कागज़ों में नाम और हिज्जे तक गलत निकले।

स्थिति सिर्फ़ प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं लगती, बल्कि बीजेपी की राजनीतिक रणनीति से जुड़ी दिखती है। इसके पीछे एक व्यापक और खतरनाक सोच दिखाई देती है—RSS की वह अवधारणा जिसमें संवैधानिक संस्थाओं को “हिंदू राष्ट्र” की दिशा में ढालने का प्रयास बताया जाता है। आरोप यह भी हैं कि आयोग खास क्षेत्रों, जातियों और धर्मों के मतदाताओं को सूची से हटाने और नकली वोट जोड़ने की प्रक्रिया में लगा है।

ये आशंकाएँ हवा में नहीं हैं। बिहार और असम के अनुभव डरावनी मिसालें हैं। बिहार में SIR के दौरान ड्राफ्ट सूची से 65 लाख नाम हटा दिए गए, जिनमें बड़ी संख्या युवा और सीमा क्षेत्र के वोटरों की थी जिन्हें मृत या बाहरी बताया गया। सुप्रीम कोर्ट की दखल से भले 21 लाख 53 हजार नाम फिर जोड़े गए, लेकिन ड्राफ्ट और अंतिम सूची के बीच इतना बड़ा अंतर चुनाव आयोग की अव्यवस्था का साफ़ संकेत था। उत्तर प्रदेश में SIR खत्म होने से पहले ही डिटेंशन सेंटरों के आदेश ने हालात को और गंभीर बना दिया।

पश्चिम बंगाल भी अब इसी खतरे का सामना कर रहा है। अब तक के डिजिटलाइजेशन के आँकड़े बेहद चिंताजनक हैं। बुधवार तक लगभग 28 लाख मतदाताओं का डेटा 2002 की सूची से मिलान नहीं हो पाया था। इनमें करीब 9 लाख मृत और 19 लाख को डुप्लीकेट, शिफ्टेड या अनुपस्थित बताया गया है—इशारा साफ़ है कि ये 28 लाख नाम ड्राफ्ट सूची से गायब हो सकते हैं।

इस बीच बीजेपी की ओर से 1 से 2 करोड़ नाम हटाने की चर्चाएँ और “बांग्लादेशी–रोहिंग्या” का नैरेटिव—पूरा माहौल सांप्रदायिक दिशा में मोड़ने की कोशिश जैसा लगता है। जबकि सच्चाई यह है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट और EPIC दोनों में दर्ज हैं, और जो कई बार मतदान कर चुके हैं, उन्हीं को अचानक “संदेह” के घेरे में डाल देना सीधी राजनीतिक दुर्भावना है।

सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर को ड्राफ्ट सूची के साथ दायर याचिकाओं की सुनवाई तय की है, जो नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उम्मीद की किरण है। लेकिन यह भी ज़रूरी है कि आम लोग हर बात के लिए अदालत के दरवाज़े खटखटाने पर मजबूर न हों। SIR की प्रक्रिया को मानवीय संवेदना और न्याय के मूल सिद्धांतों के साथ पूरा किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक ताक़तों का दायित्व है कि इस “लौ बुझाने की साज़िश” को नाकाम करें, ताकि किसी भी असली नागरिक का मताधिकार छीना न जा सके।

 

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