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मताधिकार का उत्सव या संकट? पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले मतदाता सूची पर उठते सवाल

मताधिकार पर सवाल: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची विवाद, लाखों नामों की स्थिति अस्पष्ट, चुनाव आयोग की भूमिका पर बढ़ती बहस।

 

मताधिकार: विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले लाखों नामों पर अनिश्चितता, लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर बहस तेज

Dr. Mohammad Farooque 
कोलकाता | 12 मार्च 2026

मताधिकार किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आत्मा होता है। जब नागरिकों को अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है, तब लोकतंत्र वास्तव में जीवंत बनता है। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव की घोषणा अब लगभग निश्चित मानी जा रही है, क्योंकि वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को समाप्त हो रहा है। संविधान के अनुसार उससे पहले नई विधानसभा के गठन की प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है, इसलिए संभावना है कि अप्रैल के भीतर ही चुनाव प्रक्रिया संपन्न कर ली जाए।

देश के अन्य राज्यों में भी इसी चरण में चुनाव होने वाले हैं। तमिलनाडु की विधानसभा का कार्यकाल 10 मई को समाप्त हो रहा है, असम में 20 मई, केरल में 23 मई और पुडुचेरी में 15 जून तक मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल है। ऐसे में चुनाव आयोग को सभी राज्यों के लिए चुनाव कार्यक्रम तय करना है। लेकिन पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया को लेकर एक अलग तरह की चिंता उभर रही है, जिसका केंद्र बिंदु है मतदाता सूची और उससे जुड़ी प्रशासनिक प्रक्रिया।

मताधिकार

यहीं पर मताधिकार का सवाल और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्य में मतदाता सूची को अद्यतन करने के लिए विशेष पहचान और सत्यापन प्रक्रिया (SIR) लागू की गई थी, जिसका उद्देश्य एक स्वच्छ और सटीक मतदाता सूची तैयार करना बताया गया। सिद्धांत रूप से यह कदम लोकतंत्र को मजबूत करने वाला माना जा सकता है, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर कई विवाद सामने आए हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों और नागरिक संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को परेशानी झेलनी पड़ी और कई नाम अब भी “अंडर एडजुडिकेशन” यानी न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत लंबित हैं।

पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने इस मुद्दे को लेकर लगातार आवाज उठाई है। पार्टी का दावा है कि इस प्रक्रिया के दौरान कई लोग गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और कुछ मामलों में जान भी गई। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है, लेकिन इस विवाद ने राज्य की राजनीति को कई महीनों तक गरमाए रखा।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग से इस मामले में बार-बार हस्तक्षेप की मांग की। जब समाधान नहीं निकला तो मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए मतदाता सूची से जुड़े विवादों के समाधान की प्रक्रिया पर नजर रखने का निर्देश दिया। फिलहाल मतदाता सूची से संबंधित एडजुडिकेशन की प्रक्रिया जारी है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सभी लंबित मामलों का निपटारा कब तक होगा।

हाल ही में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग का पूर्ण दल दो दिनों के दौरे पर पश्चिम बंगाल आया था। इस दौरान उन्होंने विभिन्न राजनीतिक दलों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक की। दौरे के अंत में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में उन्होंने संकेत दिया कि दिल्ली लौटकर स्थिति की समीक्षा करने के बाद चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की जाएगी।

लेकिन एक अहम सवाल अभी भी बना हुआ है—क्या चुनाव कार्यक्रम की घोषणा उन सभी मतदाताओं के मामलों के निपटारे से पहले कर दी जाएगी, जिनके नाम अभी सूची में विवादित हैं? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर देने से मुख्य चुनाव आयुक्त ने परहेज किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ही मतदाताओं की पात्रता की जांच और सूची का प्रकाशन किया जाएगा।

चुनाव आयोग के अनुसार, प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जा चुकी है। आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आने वाले नामों को छोड़कर पश्चिम बंगाल में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 6 करोड़ 44 लाख 52 हजार 609 है, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 1.20 करोड़ कम बताई जा रही है। आयोग ने यह भी दोहराया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार केवल भारतीय नागरिकों को ही मतदान का अधिकार प्राप्त है।

फिर भी राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि लाखों मतदाताओं की स्थिति स्पष्ट किए बिना चुनाव की घोषणा कर दी गई, तो इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो सकते हैं। पश्चिम बंगाल राजनीतिक रूप से अत्यंत जागरूक राज्य माना जाता है, जहां चुनाव को अक्सर लोकतंत्र के एक बड़े उत्सव के रूप में देखा जाता है। लेकिन यदि बड़ी संख्या में योग्य नागरिक इस प्रक्रिया से बाहर रह जाएं, तो यह उत्सव अधूरा रह जाएगा।

इसलिए यह जरूरी है कि चुनाव आयोग चुनाव की घोषणा से पहले हर पात्र नागरिक के मताधिकार को सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए। लोकतंत्र की मजबूती तभी संभव है जब कोई भी योग्य मतदाता अपने अधिकार से वंचित न रहे। चुनाव आयोग पर यह जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ सभी विवादों का समाधान करे और यह भरोसा कायम रखे कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा सभी नागरिकों को समान अवसर देती है।

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