केंद्र सरकार ने ‘मंसूखी विधेयक 2025’ के जरिये 71 पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को समाप्त करने की घोषणा की है, पर विपक्ष का आरोप है कि इस ‘मंसूखी विधेयक’ के तहत कुछ हालिया कानून भी निरस्त किए जा रहे हैं।
Qalam Times News Network | नई दिल्ली | 17 दिसंबर 2025
‘मंसूखी विधेयक’ ने संसद में कानूनी और राजनीतिक बहस को फिर जगा दिया है। केंद्र सरकार का दावा है कि इसका उद्देश्य औपनिवेशिक युग के पुराने और अप्रचलित कानूनों को हटाकर व्यवस्था को सरल बनाना है। लेकिन विपक्ष का कहना है कि इस विधेयक के जरिए हाल में बनाए गए कुछ प्रासंगिक कानूनों को भी कालबाह्य घोषित कर हटाया जा रहा है। मंगलवार को लोकसभा में पारित ‘मंसूखी और संशोधन विधेयक 2025’ के माध्यम से 71 कानून समाप्त और चार में संशोधन किए गए हैं।
कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि पिछली एक दशक में मोदी सरकार ने 1,577 पुराने कानून रद्द कर 15 में संशोधन किए हैं। उनका तर्क है कि यह कदम औपनिवेशिक छाया से कानूनों को मुक्त करने की दिशा में है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक पुराना कानून तीन प्रमुख नगरों में हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन या पारसी समुदायों पर भेदभाव करता था, जो आज के लोकतांत्रिक भारत में अस्वीकार्य है।

विपक्ष की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने ‘मंसूखी विधेयक’ को लेकर गंभीर आपत्तियाँ उठाईं। कांग्रेस सांसद डीन कूरियाकोस ने कहा, “सिर्फ 24 महीने पहले बने कानूनों को अगर अप्रासंगिक कहा जा रहा है, तो यह पारदर्शिता नहीं, भ्रम की रचना है।” वहीं समाजवादी पार्टी के सांसद लालजी वर्मा ने आरोप लगाया कि सरकार ने कानून निर्माण को ‘बुलेट ट्रेन’ की गति से निपटाना शुरू कर दिया है, जिससे चर्चा और समीक्षा की प्रक्रिया कमजोर हो रही है।
संशोधन और विवादित परिवर्तन
इस विधेयक के जरिए चार प्रमुख कानूनों — जनरल क्लॉज एक्ट, 1897, सिविल प्रोसीजर कोड, 1908, इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 और डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट, 2005 में संशोधन किए गए हैं। डिज़ास्टर मैनेजमेंट एक्ट में “रोकथाम” शब्द को बदलकर “तैयारी” कर देने पर विपक्ष ने तर्क दिया कि इससे आपदा निवारण के मूल सिद्धांत कमजोर होंगे।
बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने लोकसभा में कहा, “देश के कानूनी ढाँचे को सरल, पारदर्शी और आधुनिक बनाना हमारी प्राथमिकता है। जो कानून अब प्रासंगिक नहीं, उन्हें हटाना समकालीन भारत की आवश्यकता है।”
हालांकि विपक्ष इसे औपचारिक सुधार से ज़्यादा राजनीतिक चाल मान रहा है। कई नेताओं का कहना है कि यह विधेयक ‘कानूनी सुधार’ से अधिक ‘कथानक नियंत्रण’ की कोशिश है, ताकि जनता के बीच मोदी सरकार की छवि आधुनिकीकरण और कार्यक्षमता की बनी रहे।
‘मंसूखी विधेयक’ केवल कानूनी अपशिष्ट निपटान की कोशिश नहीं बल्कि नीति निर्धारण की नई दिशा का भी प्रतीक प्रतीत होता है। सवाल केवल यह है कि क्या यह परिवर्तन वास्तव में जनता के हित में है, या सत्ता की सुविधा के लिए एक और कानूनी प्रयोग?






