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मानवाधिकार दिवस और क़ायदे–उर्दू शमीम अहमद न्याय, अमन और उर्दू की पहचान की हिफ़ाज़त

मानवाधिकार दिवस पर क़ायदे–उर्दू शमीम अहमद के सामाजिक संघर्ष, उर्दू आंदोलन, फ़लाही सेवाओं और भारत में न्याय व बराबरी की लड़ाई को उजागर करती विशेष रिपोर्ट।

By Qalam Times News Network
Kolkata, 10 December, 2025

मानवाधिकार

मानवाधिकार न सिर्फ़ एक सिद्धांत है, बल्कि इंसानी समाज की बुनियादी ज़रूरत भी। 10 दिसंबर को जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मना रही है, उसी दिन क़ायदे–उर्दू जनाब शमीम अहमद का जन्मदिन भी आता है। यह तारीख़ हमें याद दिलाती है कि सामाजिक न्याय, बराबरी और अमन की लड़ाई में उनकी पच्चीस साल से जारी मेहनत कितनी अहम है।

मानवाधिकार , नेतृत्व और सोच: न्याय से अमन तक

शमीम अहमद, जो ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन एसोसिएशन (HRPA) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय संयोजक हैं, सिर्फ़ मानवाधिकार कार्यकर्ता नहीं, बल्कि एक पूरी सामाजिक मुहिम का प्रतीक हैं। उनका साफ़ मानना है कि स्थायी अमन तभी मुमकिन है जब समाज में आर्थिक अन्याय मिटे और हर व्यक्ति को बराबरी का हक़ मिले। उनका काम इस बात की गवाही देता है कि न्याय ही शांति की असली नींव है।

उर्दू आंदोलन और शैक्षिक जागरूकता, सांस्कृतिक पहचान की मजबूती

मानवाधिकार

शमीम अहमद की पहचान फ़लाही कामों तक सीमित नहीं। वे उर्दू आंदोलन के सशक्त नेता भी हैं, और इसी वजह से उन्हें “क़ायदे–उर्दू” कहा जाता है। बंगाल में उर्दू को हाशिये पर धकेले जाने के दौर में उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ उठाई।
पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने भी माना कि बिहार से आकर बंगाल में उर्दू को दूसरी सरकारी भाषा बनाने की उनकी कोशिश एक बड़ा कदम थी।

मानवाधिकार

उनका मक़सद सिर्फ़ भाषा की हिफ़ाज़त नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और शैक्षिक अधिकारों को मज़बूत करना था। भाषा को वे किसी क़ौम की तहज़ीब और विकास की रीढ़ मानते हैं। उनकी संघर्ष–कथा को लेखक नूरुल्लाह जावेद ने “संगतराश” में दस्तावेज़ की तरह दर्ज किया है।

फ़लाही पहल: भूख और बीमारी के खिलाफ़ जंग

मानवाधिकार

क़ायदे–उर्दू की सोच साफ़ है—इंसान के बुनियादी हक़ का मतलब है सही भोजन और इलाज। इसी सोच से HRPA ने दो मुहिमों की शुरुआत की—खाना सबके लिए’ इस मुहिम ने भूख से लड़ रहे लोगों तक भोजन पहुंचाने का बड़ा काम किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री मणि शंकर अय्यर ने भी इसकी सराहना की।दवाई बैंक’ इलाज की कमी से होने वाली मौतों को देखते हुए उन्होंने “दवाई बैंक” का आइडिया दिया—जहाँ बची हुई उपयोगी दवाइयाँ इकट्ठी कर उन्हें मुफ़्त में ज़रूरतमंदों तक पहुँचाया जाता है। इसे सामाजिक सहयोग का मिसाल माना गया, और कलाकार शोभा प्रसन्ना ने शमीम अहमद को “बंगाल का गर्व” कहा।

संविधान, गरीबों के अधिकार और देश की प्राथमिकताएँ

दूसरी राज्यों से रोज़ी कमाने आए मज़दूर, काग़ज़ात न होने के कारण सरकारी योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। शमीम अहमद लगातार इनके लिए आवाज़ उठाते रहे हैं। मानवाधिकार दिवस के मौके पर उन्होंने चिंता जताई कि संविधान की रक्षा की शपथ लेने वाले ही कई बार उसके अधिकारों का उल्लंघन करते दिखते हैं। राजस्थान में एक बंगाली मज़दूर की हत्या को उन्होंने देश के माथे पर दाग बताया और नफ़रत की राजनीति पर सवाल खड़े किए। उन्होंने पूछा—जब आधी आबादी गरीबी, भूख, इलाज और शिक्षा के संकट में जी रही है, तो राष्ट्रीय बहस मस्जिद–मंदिर के इर्द–गिर्द क्यों फँसी हुई है?

रौशन भविष्य की उम्मीद

मानवाधिकार

क़ायदे–उर्दू शमीम अहमद का संदेश साफ़ है—विभाजनकारी राजनीति को ठुकराना होगा। उनका भरोसा लोकतंत्र और सेकुलर मूल्यों पर है। वे ऐसा भारत चाहते हैं जहाँ हर नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक इंसाफ़ मिले। इसी निष्पक्ष समाज में, उनके मुताबिक, दुनिया का असली अमन छिपा है।

Qalam Times उनके इन लंबे और बेहतरीन सेवाभाव को सलाम पेश करता है और दुआ करता है कि उनका सफ़र यूँ ही कामयाबी के साथ आगे बढ़ता रहे।

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