लव जिहाद पर विस्तृत रिपोर्ट: ‘केरला स्टोरी 2’ विवाद, जांच एजेंसियों की पड़ताल, अदालतों के निष्कर्ष और धर्मांतरण विरोधी कानूनों की हकीकत।
लव जिहाद: ‘केरला स्टोरी 2’ के बहाने फिर गरमाया विवाद, जांच एजेंसियों और अदालतों के निष्कर्ष क्या कहते हैं
Qalam Times News Network
नई दिल्ली | 2 मार्च 2026
लव जिहाद एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। फिल्म केरला स्टोरी 2 के रिलीज़ से पहले ही उठे विवाद ने इस शब्द को दोबारा सुर्खियों में ला दिया है। फिल्म की कहानी अंतरधार्मिक संबंधों और कथित साजिश के दावों के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन सवाल वही है—क्या यह मुद्दा तथ्यों पर टिका है या राजनीतिक और सांस्कृतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा है?
दरअसल, लव जिहाद शब्द की शुरुआत केरल से जुड़े कुछ मामलों के बाद हुई थी, लेकिन समय के साथ यह उत्तर भारत की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया। भाजपा और संघ परिवार से जुड़े संगठनों ने इसे व्यापक अभियान का रूप दिया। कई भाजपा शासित राज्यों ने धर्मांतरण विरोधी कानूनों में संशोधन कर अंतरधार्मिक विवाहों को जांच के दायरे में लाने के प्रावधान जोड़े। अब फिल्मों के जरिए भी इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश दिखाई दे रही है।
‘केरला स्टोरी 2’ और विवाद

फिल्म केरला स्टोरी 2 कथित तौर पर यह दिखाती है कि गैर-मुस्लिम युवतियों को बहला-फुसलाकर उनसे शादी की जाती है और फिर धर्म परिवर्तन कराया जाता है। हालांकि फिल्म में जिन महिलाओं को पीड़िता के रूप में दर्शाया गया है, वे केरल की नहीं बल्कि उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्यों की बताई जाती हैं। फिल्म निर्माताओं ने अस्वीकरण में कहानी को काल्पनिक बताया है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इसका उद्देश्य एक खास संदेश देना है।
केरल, जिसे देश का सबसे शिक्षित राज्य माना जाता है, वहां पिछले विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। बावजूद इसके भाजपा को कोई सीट नहीं मिली। अब 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह फिल्म फिर चर्चा में है।
जांच एजेंसियों की पड़ताल

केरल पुलिस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 2009 के बाद कई मामलों की जांच की। विस्तृत पड़ताल के बाद एजेंसियों ने किसी संगठित साजिश या अभियान के ठोस प्रमाण नहीं पाए जिन्हें ‘लव जिहाद’ कहा जा सके।
2020 में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि केंद्रीय एजेंसियों के पास ‘लव जिहाद’ नाम से कोई मामला दर्ज नहीं है। एनआईए ने 11 मामलों की जांच की और उन्हें भी संगठित षड्यंत्र के रूप में प्रमाणित नहीं किया।
कानपुर में गठित विशेष जांच टीम (SIT) ने 14 मामलों की समीक्षा की। इनमें से तीन में बालिग जोड़ों ने सहमति से विवाह किया था, जबकि शेष मामलों में पहचान छिपाने जैसे आरोप सामने आए—लेकिन संगठित अभियान का प्रमाण नहीं मिला।
अदालतों का रुख
देश की विभिन्न अदालतों ने बार-बार कहा है कि बालिगों को अपनी पसंद से विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कई मामलों में धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग पर चिंता जताई है। मार्च 2025 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक मामले में उत्तर प्रदेश प्रशासन को कानून के अनुचित इस्तेमाल पर फटकार लगाई थी।
अप्रैल 2025 में दायर एक याचिका में यह आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश का कानून मुख्य रूप से मुस्लिम पुरुषों और हिंदू महिलाओं के बीच संबंधों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है। कई मामलों में शिकायत तीसरे पक्ष ने दर्ज कराई, स्वयं महिला ने नहीं।
केरल की हादिया केस
2017 में अखिला अशोकन उर्फ हादिया का मामला राष्ट्रीय बहस बना। उन्होंने इस्लाम अपनाकर अपनी इच्छा से शादी की थी। इस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए से जांच कराई और एक समिति गठित की। जांच और समिति की रिपोर्ट में जबरन धर्मांतरण या साजिश का कोई प्रमाण नहीं मिला। समिति ने स्पष्ट कहा कि यह मामला ‘लव जिहाद’ नहीं बल्कि दो वयस्कों के व्यक्तिगत निर्णय का था।
महाराष्ट्र और अन्य राज्य
2022 में श्रद्धा वालकर की हत्या के बाद महाराष्ट्र में भी ‘लव जिहाद’ को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हुई। कुछ नेताओं ने बड़ी संख्या में ऐसे मामलों का दावा किया, लेकिन पुलिस या किसी आधिकारिक एजेंसी ने इन आंकड़ों की पुष्टि नहीं की। राज्य सरकार ने अध्ययन के लिए समिति बनाई, हालांकि गठबंधन के कुछ सहयोगियों ने अलग कानून के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया।
उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून के तहत जुलाई 2025 तक 835 मामले दर्ज हुए और 1,682 गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन दोषसिद्धि का कोई ठोस आंकड़ा सामने नहीं आया। कई मामलों में प्रारंभिक जांच के बाद आरोप निराधार पाए गए।
स्पष्ट है कि ‘लव जिहाद’ शब्द कानूनी परिभाषा से अधिक एक राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। जबरन धर्मांतरण या धोखाधड़ी के मामले कानून के दायरे में पहले से आते हैं, लेकिन व्यापक साजिश के ठोस प्रमाण अब तक सामने नहीं आए।
फिल्मों और राजनीतिक अभियानों के बीच असली सवाल यही है—क्या यह वास्तविक खतरा है या सामाजिक ध्रुवीकरण का एक औजार?






