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मतदाता सूची पर सियासी टकराव: लोकतंत्र की जड़ में उठते सवाल

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से लाखों नाम हटने के आरोपों पर चुनाव आयोग और टीएमसी के बीच विवाद गहरा गया है। इस संपादकीय में लोकतंत्र, पारदर्शिता और चुनावी विश्वसनीयता पर गहन विश्लेषण।

मतदाता सूची  : चुनावी प्रक्रिया पर भरोसा तभी टिकेगा जब पारदर्शिता और राजनीतिक संयम साथ-साथ चलें

डॉ. मोहम्मद फारूक
कोलकाता | 9 मार्च 2026

मतदाता

मतदाता सूची किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ होती है। जब इसी सूची की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें, तो विवाद केवल राजनीतिक नहीं रह जाता, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी असर डालता है। पश्चिम बंगाल में चुनावी तैयारियों को लेकर हुई बैठक में चुनाव आयोग और तृणमूल कांग्रेस के बीच जो तीखी बहस हुई, उसने यही संकेत दिया है कि चुनाव से पहले राजनीतिक वातावरण पहले ही गर्म हो चुका है।

यह विवाद केवल एक बैठक का विवाद नहीं है, बल्कि उस व्यापक असंतोष की झलक है जो मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोपों के साथ सामने आ रहा है। यदि लाखों नामों के हटने की बात सच है, तो यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन जाता है।

कोलकाता में चुनाव आयोग की फुल बेंच और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के बीच हुई बैठक का उद्देश्य आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चर्चा करना था। लेकिन बातचीत जल्द ही तीखी बहस में बदल गई।

तृणमूल कांग्रेस की ओर से मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य और अन्य नेताओं ने आरोप लगाया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उनका दावा है कि लगभग 63 लाख नाम सूची से हटाए गए और करीब 60 लाख मामलों की जांच चल रही है। इसी बहस के दौरान मतदाता सूची के मुद्दे पर दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया।

दूसरी ओर चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के कारण उस पर विस्तृत चर्चा से परहेज किया गया। आयोग का पक्ष यह भी है कि सभी शिकायतें लिखित रूप में दी जानी चाहिए और नियमों के तहत उनका समाधान किया जाएगा।

चुनाव केवल मतदान का दिन नहीं होता, बल्कि उससे पहले की पूरी प्रक्रिया लोकतंत्र की विश्वसनीयता तय करती है। मतदाता सूची की शुद्धता, मतदान केंद्रों की निष्पक्षता और सुरक्षा व्यवस्था—ये सभी पहलू जनता के विश्वास से जुड़े होते हैं।

यदि किसी राज्य में लाखों मतदाताओं के नाम हटने की बात सामने आती है, तो स्वाभाविक है कि राजनीतिक दल इसे बड़ा मुद्दा बनाएंगे। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि आरोपों की जांच पारदर्शी तरीके से हो और तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाए।

लोकतंत्र में मतदाता का अधिकार सबसे मूल अधिकारों में से एक है। यदि किसी असली मतदाता का नाम सूची से हट जाता है, तो उसका मतदान का अधिकार छिन जाता है। यही कारण है कि चुनाव आयोग पर निष्पक्षता और पारदर्शिता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

विवाद केवल बैठक तक सीमित नहीं रहा। संसद में भी इस मुद्दे को उठाया गया है और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस विषय को लेकर धरने पर बैठी हैं। दूसरी ओर भाजपा और अन्य दल चुनाव को कम चरणों में कराने और अधिक सुरक्षा बल तैनात करने की मांग कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का स्वर तेज हो गया है। ममता बनर्जी ने भाजपा पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगाया है, जबकि विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग अपना काम नियमों के अनुसार कर रहा है।

चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि चुनाव निष्पक्ष और शांतिपूर्ण होंगे तथा हिंसा के प्रति उसकी नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है। आयोग का यह भी कहना है कि फॉर्म 6, 7 और 8 के माध्यम से मतदाता अभी भी अपने नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का अवसर पा सकते हैं।

लेकिन केवल औपचारिक प्रक्रिया बताना पर्याप्त नहीं है। जनता के बीच यह विश्वास बनाना भी उतना ही जरूरी है कि किसी भी मतदाता के अधिकार के साथ अन्याय नहीं होगा।

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से तीखी रही है, लेकिन चुनाव से पहले इस तरह के विवाद लोकतांत्रिक माहौल को और अधिक तनावपूर्ण बना देते हैं।

असल सवाल यह नहीं है कि कौन सा दल सही है और कौन गलत। असली सवाल यह है कि क्या हर योग्य नागरिक को मतदान का अधिकार मिलेगा और क्या चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बना रहेगा।

यदि इस विवाद से कोई सकारात्मक परिणाम निकल सकता है, तो वह यही होगा कि चुनावी व्यवस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही को और मजबूत किया जाए। क्योंकि अंततः लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता में बैठे लोगों में नहीं, बल्कि मतदान करने वाले नागरिकों में होती है।

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