जेएनयू एक बार फिर राजनीतिक निशाने पर है। छात्रों की असहमति, 5 जनवरी की हिंसा की यादें और न्यायिक सवाल—क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क की विशेष रिपोर्ट।
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क, नई दिल्ली | 6 जनवरी 2026
जेएनयू : विश्वविद्यालयी सवालों को देशद्रोह बताने की पुरानी रणनीति एक बार फिर सक्रिय
जेएनयू एक बार फिर उस राजनीति के घेरे में है, जो सवाल पूछने को अपराध और असहमति को देशद्रोह में बदल देना चाहती है। देश के सबसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाने वाले इस विश्वविद्यालय को बार-बार “टुकड़े-टुकड़े गैंग” जैसे जुमलों से बदनाम करने की कोशिश कोई नई बात नहीं है। जब भी सत्ता को अपनी नाकामियों से ध्यान हटाना होता है, जेएनयू के छात्रों और शिक्षकों को निशाना बनाया जाता है। सोमवार को कैंपस में जो कुछ हुआ और जिस तरह उस पर राजनीतिक बयानबाज़ी की गई, वह इसी सुनियोजित अभियान की अगली कड़ी है।

5 जनवरी की तारीख जेएनयू के इतिहास में पहले से ही एक दर्दनाक याद के रूप में दर्ज है। साल 2020 में इसी दिन नकाबपोश हमलावरों ने हॉस्टलों में घुसकर छात्रों पर हिंसक हमला किया था। लाठियों और लोहे की रॉड से किए गए उस हमले में कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए, जिनमें तत्कालीन छात्रसंघ अध्यक्ष आइशी घोष भी शामिल थीं। सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि सब कुछ पुलिस की मौजूदगी के बावजूद हुआ और आज, छह साल बाद भी, असली दोषी कानून की पकड़ से बाहर हैं। ऐसे में जब छात्र गुस्से और निराशा के साथ नारे लगाते हैं, तो उसे केवल “अभद्र भाषा” कहकर खारिज करना मूल समस्या से आंख चुराने जैसा है।
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगों के आरोपियों उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिका खारिज किए जाने ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया। पांच साल से बिना सज़ा के जेल में बंद इन युवाओं के मामले ने न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संविधान का अनुच्छेद 21 व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बात करता है, लेकिन लंबी विचाराधीन कैद उस भावना को कमजोर करती दिखती है। यह सवाल भी उठता है कि एक तरफ कुछ लोगों को “देशविरोधी मानसिकता” बताकर कठघरे में खड़ा किया जाता है, जबकि दूसरी ओर खुले तौर पर नफरत भरे प्रतीकात्मक प्रदर्शन सामान्य मान लिए जाते हैं।
केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और सत्तारूढ़ दल के अन्य नेताओं द्वारा जेएनयू को “देशद्रोह का अड्डा” कहना दरअसल उस वैचारिक असहजता को उजागर करता है, जो आलोचनात्मक सोच से घबराती है। राहुल गांधी, वाम दलों और तृणमूल कांग्रेस को एक काल्पनिक “गैंग” से जोड़ना राजनीतिक बयानबाज़ी से ज़्यादा कुछ नहीं। हकीकत यह है कि जेएनयू का लोकतांत्रिक चरित्र बार-बार किसी एक विचारधारा को थोपने की कोशिशों को नकारता रहा है। हाल के महीनों में त्योहारों, भोजन और सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर हुए विवाद इसी टकराव की ओर इशारा करते हैं, जहां बहुलता के बजाय एकरूपता थोपने का प्रयास दिखता है।
विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा ज़रूरी है, लेकिन यह अपेक्षा तब खोखली लगती है जब सत्ता पक्ष खुद “खान मार्केट गैंग” जैसे शब्दों से विरोधियों को नीचा दिखाए। “गैंग” जैसे शब्दों का इस्तेमाल छात्रों और बुद्धिजीवियों के लिए करना अपने-आप में मानसिक हिंसा है। जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा के अनुसार, लगाए गए नारे वैचारिक थे, किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं। इसके बावजूद उन्हें देशविरोधी ठहराने की कोशिशें जारी हैं।
आख़िरकार सवाल यही है—क्या हम ऐसे शैक्षणिक संस्थान चाहते हैं जो सिर्फ़ आधिकारिक लाइन दोहराएं, या ऐसे विश्वविद्यालय जहां सवाल पूछना अब भी ज़िंदा हो? जेएनयू पर हो रहा यह ताज़ा हमला केवल एक कैंपस तक सीमित नहीं है; यह भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की सेहत से जुड़ा मुद्दा है। इसका जवाब दमन में नहीं, बल्कि संविधान, संवाद और वैचारिक दृढ़ता में ही छिपा है।






