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Homeराजनीतिहिंदुस्तानी मुसलमान, राजनीति और हालात-ए-हाज़िरा: क़ायदे उर्दू शमीम अहमद का विस्तृत विश्लेषण

हिंदुस्तानी मुसलमान, राजनीति और हालात-ए-हाज़िरा: क़ायदे उर्दू शमीम अहमद का विस्तृत विश्लेषण

हिंदुस्तानी मुसलमानों की राजनीति, सेक्युलर पार्टियों की रणनीति, बीजेपी से दूरी, मुस्लिम नेतृत्व की कमियाँ और हालात-ए-हाज़िरा पर क़ायदे उर्दू शमीम अहमद का बेबाक विश्लेषण। मुस्लिम वोटिंग पैटर्न, सामाजिक सुधार और राजनीतिक संवाद की ज़रूरत पर एक गहरा मुकम्मल नज़र।

By Qalam Times News Network
नई दिल्ली, 30 November 2025

हिंदुस्तानी मुसलमान, राजनीति और हालात-ए-हाज़िरा

हिंदुस्तानी मुसलमानों के राजनीतिक रुझान, सेक्युलर पार्टियों की भूमिका और सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी से उनके रिश्तों पर क़ायदे उर्दू शमीम अहमद ने जो गहन और खुला विश्लेषण पेश किया है, वह मौजूदा भारतीय राजनीति और सामाजिक बहसों में सोचने के एक नए कोण को सामने लाता है।

कलम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क से खास बातचीत में, क़ायदे उर्दू शमीम अहमद ने साफ़ तौर पर यह समझाया कि किस तरह तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की रणनीति, मुस्लिम नेतृत्व की सामाजिक मुद्दों पर चुप्पी, और मुस्लिम वोटरों के दोहरे मानदंडों ने इस बड़ी अल्पसंख्यक समुदाय को राष्ट्रीय राजनीतिक धारा से दूर कर दिया है। उनका विश्लेषण केवल आलोचना नहीं, बल्कि मुसलमानों के राजनीतिक भविष्य और उनके सामाजिक-आर्थिक हितों के लिए एक ठोस दिशा भी प्रस्तुत करता है।

राजनीतिक तन्हाई का कारण: तथाकथित सेक्युलर पार्टियों की भूमिका

शमीम अहमद के मुताबिक हिंदुस्तानी मुसलमानों की मौजूदा राजनीतिक अकेलेपन की जड़ें सेक्युलर पार्टियों की बनाई हुई रणनीति में छिपी हैं।

डर की राजनीति:इन पार्टियों ने लंबे समय तक यह narrative गढ़ा कि बीजेपी “कम्यूनल” है और बाकी सब पार्टियां ही “सेक्युलर” हैं।इस प्रचार का असर यह हुआ कि मुस्लिम समाज ने जानबूझकर उस सबसे बड़ी राजनीतिक ताक़त (जो केंद्र और कई राज्यों में सत्ता में है) से दूरी बना ली।मुख्य धारा से अलगाव:समय के साथ यह दूरी मुसलमानों को न सिर्फ राष्ट्रीय राजनीति बल्कि देश के मुख्य प्रशासनिक ढांचे से भी अलग करती चली गई। शमीम अहमद के अनुसार डर पर आधारित राजनीति किसी भी बड़े समुदाय को लंबे समय में नुकसान ही पहुंचाती है।

बीजेपी का मुसलमानों से व्यवहारिक दूरी बना लेना

बीजेपी और मुसलमानों के रिश्तों की कहानी बताते हुए उन्होंने एक अहम मोड़ की ओर इशारा किया।शुरुआती रणनीति:शुरू में बीजेपी ने मुख्तार अब्बास नकवी, सिकंदर बख्त और शहनवाज़ हुसैन जैसे मुस्लिम चेहरे आगे रखे ताकि मुस्लिम समाज में जगह बनाई जा सके।राजनीतिक सच्चाई का अहसास:लेकिन जल्द ही पार्टी को समझ आ गया कि इन नेताओं को रखने या हटाने से मुस्लिम वोट पर कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता। जब मुसलमानों ने बीजेपी को वोट नहीं दिया, तो पार्टी ने भी सक्रिय रूप से मुसलमानों को नजरअंदाज़ करना शुरू कर दिया।

टिकट बंटवारे का नया तरीका:बीजेपी ने तय किया कि जब मुसलमान उन्हें वोट नहीं देते, तो टिकट उन्हीं को दिए जाएं जो उनका स्थायी वोटर आधार हैं।

इस तरह मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देना लगभग बंद हो गया, क्योंकि पार्टी के अनुसार वे अपने ही समुदाय का वोट भी नहीं दिला पाते।

डर की राजनीति में मुस्लिम नेतृत्व की चुप्पी और सहभागिता

हिंदुस्तानी मुसलमान

सेक्युलर पार्टियों द्वारा फैलाए गए डर को मुस्लिम धार्मिक नेताओं और सामाजिक नेताओं ने भी मज़बूत किया।बयानबाज़ी:इन पार्टियों ने माहौल बनाया कि “भाजपा आएगी तो यह हो जाएगा”।मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने भी इसी अंदाज़ में बयान दिए और डर की हवा को और भारी कर दिया।शमीम अहमद के मुताबिक यह माहौल मुसलमानों को रचनात्मक राजनीतिक प्रक्रिया से दूर ले गया।

तीन तलाक़ बिल और मुस्लिम सामाजिक जिम्मेदारी की कमी

यह शमीम अहमद का सबसे संवेदनशील लेकिन बेहद ज़रूरी सवाल है।सामाजिक काम की कमी:उनका कहना है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मस्जिद कमेटियां और उलेमा पिछले 80 साल में तलाक के सामाजिक मसलों, खासकर बेवजह तलाक और तलाकशुदा महिलाओं की भलाई के लिए कोई ठोस काम नहीं कर सके।

राहनुमाई का अभाव:तलाकशुदा महिलाओं के लिए न कोई सिस्टम बना, न कोई सामाजिक ढांचा।

ऐतिहासिक सन्दर्भ:उन्होंने बताया कि पैगम्बर ए इस्लाम ﷺ के दौर में तलाकशुदा और बेवा महिलाओं को सम्मान हासिल था और रिश्ते पहले उन्हीं के पास भेजे जाते थे।लेकिन आज की मुस्लिम नेतृत्व ने इस विषय को कभी अहमियत ही नहीं दी ۔सरकार की दखलअंदाजी:मोदी सरकार को लगा कि यह सामाजिक ज़रूरत है, इसलिए कानून बनाना पड़ेगा।

जो सुधार मुस्लिम संगठनों को खुद करना चाहिए था, वह सरकार के जरिए लागू हुआ।मुसलमानों का राजनीतिक दोहरा मानदंड:शमीम अहमद ने यह भी कहा कि मुस्लिम समाज वोट देने में एक साफ़ दोहरा मापदंड अपनाता है।

सिर्फ पार्टी आधारित वोटिंग:बाबुल सुप्रियो की मिसाल देते हुए उन्होंने बताया कि बीजेपी में रहते मुसलमानों ने उन्हें वोट नहीं दिया, लेकिन जैसे ही वे TMC में आए, मुसलमानों ने उन्हें खूब समर्थन दिया।इससे साफ है कि वोट उम्मीदवार की योग्यता पर नहीं, सिर्फ पार्टी पर दिया जाता है।राजनीतिक रुकावट:अगर कोई मुसलमान बीजेपी या किसी ऐसी पार्टी में जाए जिसे “मुस्लिम विरोधी” कहा जाता है, तो खुद मुसलमान और सेक्युलर पार्टियां एक ऐसा माहौल बना देते हैं कि वह नेता न अपनी कौम का रहता है, न पार्टी में टिक पाता है। बाकी समुदायों के लिए यह रुकावट नहीं होती—वे आज बीजेपी में हों, कल किसी और पार्टी में जा सकते हैं।

अंतिम सलाह: बातचीत और राजनीतिक सहभागिता की ज़रूरत

शमीम अहमद का मूल संदेश यह है कि भारत के करीब 18% मुसलमान अगर देश की मुख्य राजनीतिक व्यवस्था (जिसमें आज बीजेपी की सरकार है) से दूरी बनाए रखेंगे, तो उनके हालात कैसे सुधरेंगे?

सरकारी योजनाएं—जैसे मकान, सब्सिडी, सुविधाएं—सबके लिए आती हैं, किसी एक समुदाय के लिए नहीं। उनकी साफ राय है:अगर मुसलमान राजनीतिक प्रक्रिया से अलग रहेंगे, तो यह देश और समुदाय दोनों के लिए नुकसानदेह होगा।

बातचीत का रास्ता:मुसलमानों को बीजेपी से संवाद का दरवाज़ा खोलना चाहिए, चर्चा करनी चाहिए और खुद को अलग-थलग नहीं करना चाहिए।चारों तरफ़ से रास्ता बंद कर लेना खतरा ही पैदा करेगा—मुसलमानों के लिए भी और मुल्क के लिए भी।

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