गरिमा पर सवाल: बिहार में महिला डॉक्टर के साथ सार्वजनिक मंच पर हुए व्यवहार ने सत्ता, जवाबदेही और महिला सम्मान पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
Patna 18 दिसंबर 2025
सार्वजनिक मंच पर हुआ व्यवहार, राजनीति और नैतिकता—तीनों के लिए गंभीर परीक्षा- गरिमा पर सवाल
गरिमा तब सबसे अधिक खतरे में पड़ती है, जब सत्ता स्वयं उसकी सीमाएं लांघ दे। 15 दिसंबर 2024 को पटना में आयोजित एक सरकारी समारोह में ऐसा ही एक दृश्य सामने आया, जिसने बिहार की राजनीति को असहज सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा नियुक्ति पत्र ग्रहण करने आई मुस्लिम महिला डॉक्टर नुसरत परवीन के हिजाब को सार्वजनिक रूप से छूने और खींचने की घटना ने महिला सम्मान और सत्ता की जवाबदेही पर तीखी बहस छेड़ दी है।

यह घटना किसी आकस्मिक भूल का परिणाम नहीं मानी जा रही। वीडियो रिकॉर्डिंग में स्पष्ट है कि मंच पर मौजूद डॉक्टर नुसरत परवीन के साथ हुआ यह व्यवहार सत्ता के उस आत्मविश्वास को दर्शाता है, जो अक्सर गरिमा की परवाह किए बिना खुद को सर्वशक्तिमान समझने लगता है। सवाल केवल हिजाब या धार्मिक पहचान का नहीं है, बल्कि उस स्त्री के सम्मान का है, जो एक पेशेवर डॉक्टर के रूप में अपने अधिकार के साथ मंच पर खड़ी थी।
यदि यही कृत्य किसी आम नागरिक द्वारा किया गया होता, तो पुलिस, प्रशासन और मीडिया तत्काल सक्रिय हो जाते। लेकिन जब वही काम राज्य का मुखिया करता है, तो उसे “गलतफहमी” या “सामान्य घटना” बताकर टालने की कोशिश की जाती है। गरिमा के इस दोहरे मापदंड ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
घटना के बाद सत्ता पक्ष की चुप्पी भी कम चिंताजनक नहीं रही। न मुख्यमंत्री की ओर से माफी आई, न जनता दल (यूनाइटेड) ने कोई सार्वजनिक सफाई दी। भाजपा, जो अक्सर नैतिक मूल्यों की बात करती है, इस मुद्दे पर मौन साधे रही। राष्ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोग—जो छोटे बयानों पर भी संज्ञान लेते हैं—इस खुले अपमान पर निष्क्रिय दिखाई दिए। यह चुप्पी बताती है कि व्यवस्था में महिला सम्मान आज भी शक्ति-संतुलन के अधीन है।
विपक्षी दलों ने हालांकि प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की, जबकि राजद देखें और समाजवादी पार्टी ने कड़ी आलोचना की। ऑल इंडिया मुस्लिम विमेन्स पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने न्यायिक हस्तक्षेप की अपील की। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश के मंत्री संजय निषाद का बयान—“वह भी एक आदमी है”—महिला अपमान को पुरुष स्वभाव का बहाना बनाता प्रतीत हुआ, जिस पर बाद में शिकायत भी दर्ज हुई।
यह पहला मौका नहीं है जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के व्यवहार पर महिलाओं के प्रति असंवेदनशीलता के आरोप लगे हों। विधानसभा में राबड़ी देवी पर की गई टिप्पणियां और 2023 में जनसंख्या नियंत्रण पर दिया गया विवादित बयान पहले भी सवालों के घेरे में रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आज राजनीतिक समीकरण बदले हुए हैं, इसलिए कल के आलोचक आज खामोश हैं।
इस पूरे प्रकरण का सबसे पीड़ादायक पहलू डॉक्टर नुसरत परवीन की व्यक्तिगत स्थिति है। वर्षों तक सम्मान के साथ शिक्षा और चिकित्सा सेवा देने वाली यह डॉक्टर अब सरकारी नौकरी छोड़ने पर विचार कर रही हैं। घटना के अगले ही दिन बिहार छोड़कर कोलकाता जाना उनके भय, मानसिक आघात और असुरक्षा को दर्शाता है।
विडंबना यह है कि बिहार की राजनीति में महिलाओं के नाम पर योजनाओं और आर्थिक सहायता के जरिए समर्थन जुटाया जाता है। लेकिन जब उसी महिला की गरिमा पर आघात होता है, तो सभी वादे और दावे खोखले साबित होते हैं। वोट खरीदे जा सकते हैं, सम्मान नहीं।
इस घटना पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी सामने आई। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे महिलाओं की स्वायत्तता और पहचान पर हमला बताया। प्रसिद्ध लेखक जावेद अख्तर ने भी इसे अस्वीकार्य बताते हुए बिना शर्त माफी की मांग की। इसके बावजूद, सत्ता के शीर्ष से अब तक कोई स्पष्ट और जिम्मेदार जवाब नहीं आया है।
जब सत्ता जवाबदेह नहीं रहती, तो वह असभ्यता में बदल जाती है। और जब असभ्यता सामान्य हो जाए, तो लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाता है। अब यह बिहार की जनता को तय करना है कि उसे योजनाओं की राहत चाहिए या गरिमा की गारंटी—क्योंकि जो हाथ आज एक महिला का हिजाब खींच सकता है, वह कल संविधान के पन्ने पलटने से भी नहीं हिचकेगा।






