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बाबरी मस्जिद विवाद: बंगाल की सियासत में नई हलचल, इफ्तार मंच से उठा तीखा सवाल

बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई हलचल। इफ्तार मंच से मस्जिद निर्माण पर उठे सवाल, हुमायूं कबीर का पलटवार और चुनावी समीकरणों पर असर की पूरी रिपोर्ट।

कोलकाता, 26 फरवरी 2026
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

बाबरी मस्जिद विवाद एक बार फिर पश्चिम बंगाल की राजनीति के केंद्र में आ गया है। विधानसभा चुनाव से पहले मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में प्रस्तावित मस्जिद निर्माण को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। कोलकाता नगर निगम के इफ्तार कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौजूदगी में एक प्रमुख इमाम ने मस्जिद निर्माण के मुद्दे पर खुलकर नाराज़गी जताई, जिससे राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है।

इफ्तार मंच से उठी आपत्ति

इफ्तार समारोह के दौरान कोलकाता की सोलआना मस्जिद के इमाम अब्दुल हामिद ने बिना किसी का नाम लिए कहा कि मस्जिद बनाकर मुसलमानों के बीच फूट डालने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह तरीका ठीक नहीं है और इसकी निंदा होनी चाहिए।

बाबरी

अपने भाषण में उन्होंने यह भी दावा किया कि संबंधित मस्जिद निर्माण में किसी इमाम की भूमिका नहीं है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उनका इशारा मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में निलंबित तृणमूल विधायक और जनता उन्नयन पार्टी के अध्यक्ष हुमायूं कबीर की ओर था, जिन्होंने 6 दिसंबर को मस्जिद निर्माण कार्य शुरू कराया था। इसी बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर अब सियासी बहस और तेज हो गई है।

हुमायूं कबीर का पलटवार

इमाम की टिप्पणी के बाद हुमायूं कबीर ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें किसी इमाम के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। साथ ही आरोप लगाया कि कुछ लोग व्यक्तिगत लाभ और भत्तों के कारण सत्ता के करीब बने रहते हैं।

बाबरी

कबीर का यह भी कहना था कि उनके काम से किसे आपत्ति है, इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। उनका दावा है कि यह निर्माण एक ऐतिहासिक स्मृति को जीवित रखने का प्रयास है।

6 दिसंबर की प्रतीकात्मक तारीख

1992 में 6 दिसंबर को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराए जाने की घटना भारतीय राजनीति का अहम मोड़ रही है। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट ने वहां राम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ किया और जनवरी 2024 में मंदिर का उद्घाटन भी हो चुका है।

ऐसे में पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले उसी तारीख को मस्जिद निर्माण शुरू करने के फैसले को कई लोग राजनीतिक संदेश के तौर पर देख रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि इससे राज्य की पहले से मौजूद ध्रुवीकरण की राजनीति और गहरी हो सकती है।

तृणमूल की चिंता या रणनीति?

पिछले डेढ़ दशक से राज्य की अल्पसंख्यक आबादी का बड़ा हिस्सा तृणमूल कांग्रेस के साथ खड़ा रहा है। लेकिन हुमायूं कबीर द्वारा नई पार्टी बनाने और मस्जिद निर्माण जैसे कदमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या इस समर्थन में दरार आ सकती है।

बाबरी

इफ्तार मंच से इमाम का बयान इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की सराहना करते हुए कहा कि उनके शासन में सिर्फ अल्पसंख्यक ही नहीं, सभी धर्मों के लोगों को विकास का लाभ मिला है।

सरकारी योजनाओं का जिक्र

इमाम अब्दुल हामिद ने इमाम भत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य सरकारी योजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल की कई योजनाओं को दूसरे राज्यों ने भी अपनाया है।

उन्होंने इस्लामिया अस्पताल के सुधार का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले जहां हालात खराब थे, वहीं अब दूसरे राज्यों से भी मरीज इलाज के लिए आ रहे हैं।

साथ ही फुरफुरा शरीफ में 100 बेड के अस्पताल के लिए मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया गया। इससे पहले मुख्यमंत्री जैन समुदाय के एक कार्यक्रम में भी शामिल हुई थीं, जहां से कई सरकारी परियोजनाओं का उद्घाटन किया गया।

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