संशोधन के तहत असम की मतदाता सूची से 10.56 लाख नाम हटाए गए, चुनाव से पहले प्रक्रिया पर विपक्ष ने अल्पसंख्यकों के मताधिकार को लेकर सवाल खड़े किए।
Qalam Times News Network
गुवाहाटी | 28 दिसंबर 2025
विधानसभा चुनाव से पहले विशेष संशोधन प्रक्रिया पर सवाल, विपक्ष ने उठाई मतदाता बहिष्कार की आशंका
संशोधन प्रक्रिया के तहत असम की मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव किया गया है। विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले चुनाव आयोग ने विशेष संशोधन (Special Revision – SR) के बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची जारी की है, जिसमें 10 लाख 56 हजार से अधिक नाम हटा दिए गए हैं। नई सूची के अनुसार राज्य में अब कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 2 करोड़ 51 लाख से कुछ अधिक रह गई है। इस कदम ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर नई बहस को जन्म दे दिया है।

चुनाव आयोग के मुताबिक, संशोधन के दौरान नाम हटाने के तीन मुख्य कारण सामने आए—मृत्यु, पता बदलना और डुप्लीकेट प्रविष्टियां। आंकड़ों के अनुसार, लगभग 4.78 लाख नाम मृत मतदाताओं के, 5.23 लाख नाम स्थान परिवर्तन के चलते और करीब 53 हजार नाम एक जैसे विवरण पाए जाने के कारण हटाए गए। यह पूरी कवायद 22 नवंबर से 20 दिसंबर के बीच घर-घर जाकर सत्यापन के बाद पूरी की गई, जिसमें चुनाव कर्मियों ने 61 लाख से अधिक घरों का दौरा किया।
ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद मतदाताओं को 22 जनवरी 2026 तक दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर दिया गया है, जबकि अंतिम मतदाता सूची 10 फरवरी 2026 को प्रकाशित की जाएगी। हालांकि, इस प्रक्रिया में 93 हजार से अधिक ‘डी-वोटर्स’ यानी संदिग्ध मतदाताओं को मतदान अधिकार से बाहर रखा गया है, जिनकी नागरिकता पर पहले से सवाल उठते रहे हैं।

इस विशेष संशोधन को लेकर विपक्षी दलों ने गंभीर आपत्तियां जताई हैं। उनका आरोप है कि यह प्रक्रिया अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर बंगाली मूल के हिंदू और मुस्लिम मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है, जो पारंपरिक रूप से विपक्ष का समर्थन करते रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि नागरिकता सत्यापन से जुड़ी यह कवायद 1985 के असम समझौते और एनआरसी की अधूरी प्रक्रिया के चलते पहले से संवेदनशील माहौल को और तनावपूर्ण बना रही है।
मानवाधिकार संगठनों का भी मानना है कि डी-वोटर प्रणाली कई मामलों में अन्यायपूर्ण साबित हुई है, क्योंकि इसमें नागरिकता साबित करने का पूरा बोझ व्यक्ति पर डाल दिया जाता है। फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में मामलों की सुनवाई में देरी और कथित पूर्वाग्रह के चलते हजारों लोग सामाजिक असुरक्षा और प्रशासनिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
चुनाव आयोग का तर्क है कि यह कदम मतदाता सूची को शुद्ध और सटीक बनाने के लिए जरूरी था, ताकि आगामी चुनाव निष्पक्ष तरीके से कराए जा सकें। लेकिन जैसे-जैसे 2026 का असम विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है, यह संशोधन प्रक्रिया राज्य की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है।






