असम बेदख़ली — बांग्ला भाषी मुस्लिम परिवारों की बेदख़ली पर विस्तृत रिपोर्ट। नागांव जिले में 795 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि से 1,500 से अधिक परिवार हटाए गए। सरकारी कार्रवाई, निवासियों के दावे, पुनर्वास की मांग और वन क्षेत्र संरक्षण पर गहन विश्लेषण।
By Qalam Times News Network
नई दिल्ली | 30 नवंबर 2024
बांग्ला भाषी मुस्लिम परिवारों पर विस्तृत रिपोर्ट
बांग्ला भाषी मुस्लिम परिवारों को असम के नागांव ज़िले में एक बड़े पैमाने पर बेदख़ली अभियान का सामना करना पड़ा, जहाँ प्रशासन ने आरक्षित वन भूमि को खाली कराने के लिए शनिवार को कार्रवाई शुरू की। अधिकारियों के अनुसार, लुटीमारी इलाके में पिछले कई दशकों से रह रहे इन परिवारों को पहले ही नोटिस दिया गया था, लेकिन बांग्ला भाषी मुसलमानों का कहना है कि उन्हें न तो भूमि की स्थिति की सही जानकारी दी गई और न पुनर्वास की कोई ठोस योजना प्रस्तुत की गई।
आरक्षित वन क्षेत्र में चला ध्वस्तीकरण अभियान
अधिकारियों ने बताया कि तीन महीने पहले जारी नोटिस के बाद शुरुआत में दो महीने की समयसीमा दी गई थी, जिसे निवासियों के अनुरोध पर एक महीने और बढ़ाया गया। इसी दौरान कई परिवारों ने स्वयं अपने घर ढहाकर सामान समेत क्षेत्र छोड़ दिया, जबकि कुछ पक्के और कच्चे घरों को प्रशासनिक अभियान के दौरान गिराया गया।
दूसरी ओर, बांग्ला भाषी मुस्लिम परिवारों का कहना है कि वे करीब 40 साल से वहाँ रह रहे थे और उन्हें पता नहीं था कि यह भूमि आरक्षित वन क्षेत्र में आती है।
असम ट्रिब्यून से बात करते हुए एक बेदख़ल निवासी ने कहा कि प्रशासन को कम से कम पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए थी। उनके मुताबिक, “हम आदेश के मुताबिक यहाँ से हट गए, लेकिन अब हमारे पास आगे कहाँ जाएँ—इसका जवाब किसी के पास नहीं है।”
वन विभाग के विशेष मुख्य सचिव एम. के. यादव ने कहा कि अतिक्रमण हटाने से वन भूमि सुरक्षित होगी और मानव–हाथी संघर्ष कम करने में मदद मिलेगी।
मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा पहले भी सरकारी और वन भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति दोहराते रहे हैं। सरकार का दावा है कि 2021 के बाद से 160 वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा भूमि अतिक्रमण-मुक्त कराई गई है।
2016 के बाद तेज़ हुआ अभियान, सबसे ज़्यादा निशाने पर वही समुदाय

बीजेपी सरकार के आने के बाद बेदख़ली अभियान कई जिलों में चलाए गए हैं और इनका असर ज्यादातर उन इलाकों पर पड़ा है जहाँ बांग्ला भाषी मुस्लिम आबादी रहती थी। कई विस्थापित परिवारों ने बताया कि उनके पूर्वज ब्रह्मपुत्र नदी के कटाव के बाद भूमिहीन हो गए थे और मजबूरी में इन इलाकों में बस गए थे।
यह अभियान न सिर्फ़ पर्यावरण संरक्षण की सरकारी दलील पेश करता है, बल्कि उन हजारों परिवारों की जोखिमभरी स्थिति भी उजागर करता है जिनके पास न कानूनी दस्तावेज़ हैं, न नई ज़मीन पर नया जीवन शुरू करने की कोई व्यवस्था।






