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SIR पर सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी का सीधा वार, चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में ममता बनर्जी की सीधी दलील, चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप, जानिए पूरी सुनवाई और इसके राजनीतिक मायने।

 SIR विवाद : यह वोटर रिवीजन नहीं, लोकतंत्र की परीक्षा है” — बंगाल की मुख्यमंत्री

 SIR

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क | विशेष संवाददाता

नई दिल्ली | 4 जनवरी 2026

SIR को लेकर देश की राजनीति और न्यायपालिका के बीच टकराव अब सुप्रीम कोर्ट के केंद्र में आ गया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को स्वयं सर्वोच्च अदालत पहुँचीं और चुनाव आयोग के खिलाफ अपनी याचिका पर व्यक्तिगत रूप से पक्ष रखा। किसी मौजूदा मुख्यमंत्री का इस तरह खुद अदालत में पेश होकर दलील देना असाधारण माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि वह किसी संवैधानिक पदाधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक सामान्य नागरिक की हैसियत से अदालत के सामने खड़ी हैं। उनका कहना है कि SIR के नाम पर बंगाल में मतदाता सूची से लाखों वास्तविक वोटरों के नाम हटाए जा रहे हैं, जो सीधे तौर पर लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट है।

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची की विशेष गहन समीक्षा का उद्देश्य फर्जी, डुप्लिकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाना बताया गया है। लेकिन ममता बनर्जी का आरोप है कि SIR को एक “नाम काटने के औज़ार” में बदल दिया गया है। उन्होंने अदालत को बताया कि पहले चरण में ही लगभग 58 लाख लोगों को मृत या संदिग्ध बताकर सूची से बाहर कर दिया गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह प्रक्रिया असामान्य रूप से तेज़ी से, महज़ कुछ महीनों में पूरी की जा रही है, जबकि सामान्यतः इसमें वर्षों लगते हैं। नोटिस फसल कटाई और त्योहारों के समय भेजे गए, जब बड़ी संख्या में लोग अपने घरों से बाहर होते हैं।

यह चुनाव आयोग नहीं, व्हाट्सऐप कमीशन है”

सुनवाई के दौरान ममता बनर्जी ने तीखे शब्दों में कहा कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था की तरह नहीं, बल्कि निर्देशों पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा,
“न्याय बंद कमरों के पीछे रो रहा है। मैंने आयोग को छह बार पत्र लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।”

उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है, जबकि असम और अन्य राज्यों में SIR लागू नहीं किया गया। उनका सवाल था—अगर प्रक्रिया निष्पक्ष है, तो केवल कुछ राज्यों में ही क्यों?

महिलाओं, गरीबों और अल्पसंख्यकों पर असर

मुख्यमंत्री ने अदालत को बताया कि शादी के बाद महिलाओं का सरनेम बदलना बंगाल में सामान्य बात है, लेकिन इसे “अनॉमली” बताकर नाम काटे जा रहे हैं। इसी तरह, काम की तलाश में दूसरे राज्यों में गए लोगों के नाम भी हटाए गए।

उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग इस प्रक्रिया से सबसे ज़्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

माइक्रो-ऑब्जर्वर पर सवाल

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पहले जहां बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) निर्णय लेते थे, अब बाहरी राज्यों से लाए गए माइक्रो-ऑब्जर्वर नाम काटने की सिफारिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि लगभग 3,800 ऐसे ऑब्जर्वर बंगाल में तैनात किए गए हैं।

इस पर भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत ने संकेत दिया कि ज़रूरत पड़ने पर हर नोटिस को BLO से प्रमाणित करवाने का निर्देश दिया जा सकता है।

चुनाव आयोग ने अदालत में दावा किया कि बंगाल सरकार SIR प्रक्रिया में पूरा सहयोग नहीं कर रही। आयोग के अनुसार, दस्तावेज़ सत्यापन के लिए पर्याप्त सक्षम अधिकारी नहीं भेजे गए, जिसके चलते माइक्रो-ऑब्जर्वर नियुक्त करने पड़े। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि आयोग पर लगाए गए आरोप तथ्यात्मक नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए 10 फरवरी तक जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही, राज्य सरकार को भी निर्देश दिया गया है कि वह क्लास-2 अधिकारियों की सूची दे, जिन्हें SIR में डिप्यूटेशन पर लगाया जा सके।

यह मामला सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है। SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई तय करेगी कि मतदाता सूची की समीक्षा लोकतंत्र की रक्षा का साधन बनेगी या राजनीतिक विवाद का हथियार। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है।

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