साहस के साथ भारतीय मुसलमान पहचान, हिंसा और कानूनी चुनौतियों का सामना कैसे कर रहे हैं—अपूर्वानंद के लेख के संदर्भ में विस्तृत विश्लेषण।
क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
नई दिल्ली, 31 जनवरी 2026

साहस आज के भारत में मुसलमान होने का सबसे सटीक शब्द बन चुका है। पहचान मिटाए जाने की कोशिशें, रोज़मर्रा की असुरक्षा, हिंसा की आशंका और अंतहीन कानूनी लड़ाइयों के बीच भी भारतीय मुसलमान झुके नहीं हैं। जाने-माने विचारक और स्तंभकार अपूर्वानंद के लेख “भारत के मुसलमानों ने घुटने नहीं टेके” के संदर्भ में यह समझना ज़रूरी है कि मौजूदा हालात में मुसलमान किस तरह अपने नागरिक अधिकारों और आत्मसम्मान की रक्षा कर रहे हैं।
पिछले एक दशक से बार-बार एक सवाल उछाला जा रहा है— “मुसलमानों को क्या करना चाहिए?”। यह सवाल अपने आप में पक्षपाती है। कोई यह नहीं पूछता कि हिंदुओं, जैनों या अन्य समुदायों को क्या करना चाहिए। साहस यहीं से शुरू होता है—इस सवाल को ही चुनौती देने से। भारतीय मुसलमान कोई एकरूप समूह नहीं हैं। वे डॉक्टर हैं, शिक्षक हैं, मज़दूर हैं, कलाकार हैं, किसान हैं। लेकिन आज हालात ऐसे बना दिए गए हैं कि उनकी हर पहचान पर केवल एक ठप्पा हावी कर दिया गया है—मुसलमान।
पहचान का संकुचन और भय का विस्तार
ए.आर. रहमान, शाहरुख़ ख़ान, आमिर ख़ान, सैफ अली ख़ान, मोहम्मद शमी या मोहम्मद सिराज—ये सभी अपनी-अपनी विधाओं में देश का नाम रोशन करने वाले लोग हैं। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब उनकी उपलब्धियाँ गौण हो जाती हैं और उनकी धार्मिक पहचान मुख्य बना दी जाती है। साहस के साथ यह स्वीकार करना होगा कि यह केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि एक सुनियोजित सामाजिक प्रक्रिया है।
आज भारत में एक आम मुसलमान का जीवन अनिश्चितता से भरा है। ट्रेन, सड़क, बाज़ार—कहीं भी हिंसा की आशंका बनी रहती है। पुलिस और प्रशासन, जिनसे सुरक्षा की उम्मीद होती है, कई बार भय का कारण बन जाते हैं। घर गिराए जा सकते हैं, नाम मतदाता सूची से काटे जा सकते हैं, और न्याय पाने की राह लंबी व थकाने वाली हो सकती है।
क़ानून, राजनीति और रोज़मर्रा की लड़ाई

मुसलमान आज सबसे ज़्यादा अदालतों का सामना कर रहे हैं—नफ़रत फैलाने वाले भाषणों के ख़िलाफ़, गिरफ़्तारियों के बाद ज़मानत के लिए, बुलडोज़र कार्रवाई के विरुद्ध। ज़किया जाफ़री, बिलक़ीस बानो और लिंचिंग पीड़ितों के परिवारों की लड़ाइयाँ इस साहस की मिसाल हैं कि जब सब कुछ खिलाफ़ हो, तब भी संविधान पर भरोसा छोड़ा नहीं जाता।
राजनीतिक स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। मताधिकार, प्रतिनिधित्व और बराबरी—ये सब अधिकार दबाव में हैं। फिर भी मुसलमान गिड़गिड़ा नहीं रहे। वे रहम नहीं माँग रहे। वे नागरिक के रूप में अपना हक़ माँग रहे हैं।
असली सवाल क्या है?
अपूर्वानंद अपने लेख में साफ़ कहते हैं— “मुसलमानों को क्या करना चाहिए?” भारत के लिए ग़लत सवाल है। सही सवाल यह है— “हिंदुओं को क्या करना चाहिए?”। क्योंकि लोकतंत्र की सेहत इस बात पर निर्भर करती है कि बहुसंख्यक समाज अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कितना तैयार है।
साहस के साथ भारतीय मुसलमान आज भी इस देश की ज़मीन, इसके संविधान और इसके लोकतांत्रिक मूल्यों पर अपना बराबरी का दावा पेश कर रहे हैं। यही बात कुछ राजनीतिक ताक़तों को असहज करती है।






