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नफ़रत की आंधी और सत्ता की चुप्पी, सहअस्तित्व की भूमि पर बढ़ता असहिष्णुता का साया

नफ़रत और राजनीतिक चुप्पी के बीच भारत में बढ़ती हिंसा, मॉब लिंचिंग और नस्लीय भेदभाव पर Qalam Times News Network का विशेष विश्लेषण।

डॉ. मोहम्मद फारूक़ | क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
कोलकाता | 30 दिसंबर 2025

नफ़रत आज उस भारत की पहचान बनती जा रही है, जिसे कभी विविधता, सहिष्णुता और भाईचारे के लिए जाना जाता था। सदियों तक अलग-अलग धर्मों, जातियों और संस्कृतियों को अपनाने वाली यह धरती अब ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां इंसान की जान से ज्यादा उसकी पहचान को तौला जा रहा है। देश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रही हिंसा की घटनाएं बताती हैं कि कट्टरता को राष्ट्रवाद और बर्बरता को बहादुरी का नाम दिया जा रहा है।

नफ़रत

पड़ोसी देशों में होने वाले अत्याचारों पर आक्रोश जताना स्वाभाविक है, लेकिन नफ़रत तब और डरावनी हो जाती है जब वही संवेदनशीलता अपने ही समाज के पीड़ितों के लिए गायब हो जाए। बिहार के नालंदा में एक गरीब मुस्लिम हाकर की हत्या हो या केरल में छत्तीसगढ़ के दलित युवक को “बांग्लादेशी” बताकर पीट-पीट कर मार देना—इन घटनाओं पर सत्ता के गलियारों में पसरा सन्नाटा कई सवाल खड़े करता है। ओडिशा में मुस्लिम मजदूरों की मॉब लिंचिंग यह साफ कर देती है कि कानून का डर अब कमजोर पड़ता जा रहा है।

इस सामाजिक कठोरता की सबसे भयावह तस्वीर देहरादून में सामने आई, जहां त्रिपुरा की छात्रा एंजेल चकमा को उसकी शक्ल-सूरत के कारण हिंसा का शिकार होना पड़ा। एक होनहार एमबीए छात्रा, जो साधारण काम से घर से निकली थी, नस्लीय गालियों और क्रूर हमले का सामना करने को मजबूर हुई। उसकी टूटी हुई रीढ़ केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ढांचे के टूटने का प्रतीक है। सत्रह दिनों तक अस्पताल में जीवन और मृत्यु से जूझने के बाद भी व्यवस्था उसके लिए कुछ न कर सकी।

नफ़रत

उत्तर-पूर्व के लोगों के खिलाफ उत्तर भारत में बढ़ता नस्लीय भेदभाव कोई संयोग नहीं है। यह वर्षों से गढ़े जा रहे उस जहरीले विमर्श का नतीजा है, जो युवाओं के दिमाग में भरा जा रहा है। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कई नेताओं ने चेताया है कि जब नफ़रत को सामान्य बना दिया जाता है, तो समाज धीरे-धीरे संवेदनहीन हो जाता है। त्योहारों के समय अल्पसंख्यक समुदायों को डराना और पूजा स्थलों पर हमले करना संविधान की मूल भावना पर सीधा प्रहार है।

सबसे चिंताजनक पहलू राजनीतिक नेतृत्व की चुप्पी है। जब सत्ता में बैठे लोग ऐसे अपराधों की खुलकर निंदा नहीं करते, तो हिंसा करने वालों को यह संकेत मिलता है कि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं। सवाल यह नहीं है कि देश किस दिशा में जा रहा है, सवाल यह है कि क्या हम समय रहते रुक पाएंगे। अगर आज इस बढ़ती असहिष्णुता का सामना नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। यह सिर्फ चिंता जताने का नहीं, बल्कि इंसानियत को बचाने के लिए ठोस कदम उठाने का समय है।

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