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स्वायत्तता पर सरकारी प्रहार: साहित्य अकादमी एक निर्णायक मोड़ पर

स्वायत्तता पर संकट: साहित्य अकादमी में सरकारी हस्तक्षेप ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और साहित्यिक संस्थानों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क़लम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क
Kolkata, 22 दिसंबर 2025

स्वायत्ततासाहित्यिक स्वतंत्रता बनाम सत्ता की दखल—एक खामोश लेकिन खतरनाक टकराव

स्वायत्तता आज भारत की सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था, साहित्य अकादमी, के लिए सिर्फ एक सिद्धांत नहीं रही—यह अस्तित्व का प्रश्न बन चुकी है। जिस अकादमी को देश के महान लेखकों और विचारकों ने रचनात्मक स्वतंत्रता और बौद्धिक गरिमा के प्रतीक के रूप में दशकों में गढ़ा था, वह अब सरकारी हस्तक्षेप के साए में खड़ी दिखाई देती है।

18 दिसंबर 2025 को दिल्ली के रवींद्र भवन में साहित्य अकादमी के वार्षिक साहित्य पुरस्कारों की घोषणा के लिए सब कुछ तैयार था। 24 भाषाओं के लिए कार्यकारी बोर्ड द्वारा सर्वसम्मति से स्वीकृत सूची—जो निष्पक्ष और स्वतंत्र जूरी की लंबी प्रक्रिया का परिणाम थी—प्रेस के सामने रखी जानी थी। तभी अचानक एक कनिष्ठ कर्मचारी ने आकर सूचित किया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस रद्द कर दी गई है। यह सूचना नहीं, बल्कि स्वायत्तता पर पड़ा एक सन्न कर देने वाला प्रहार था।

स्वायत्तता

दूसरे ही क्षण स्पष्ट हो गया कि यह निर्णय संस्कृति मंत्रालय के एक नोट के बाद लिया गया है। जुलाई 2025 में हुए एक समझौता ज्ञापन का हवाला देते हुए मंत्रालय ने निर्देश दिया कि साहित्य अकादमी समेत चार स्वायत्त सांस्कृतिक संस्थान अब किसी भी पुरस्कार या संगठनात्मक निर्णय से पहले मंत्रालय से ‘परामर्श’ करेंगे। इस कथित प्रशासनिक प्रक्रिया के पीछे स्वायत्तता को नियंत्रित करने की मंशा साफ झलकती है।

स्वायत्तता

कार्यकारी बोर्ड ने पहले ही 24 भाषाओं के पुरस्कार विजेताओं की सूची को मंजूरी दे दी थी और इसे सार्वजनिक करना मात्र औपचारिकता रह गया था। लेकिन मंत्रालय के एक प्रतिनिधि द्वारा ‘नामों की समीक्षा’ का सुझाव सामने आते ही विवाद खड़ा हो गया। बोर्ड ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया, क्योंकि अकादमी का संविधान उसे स्वतंत्र निर्णय का अधिकार देता है। इसके बावजूद पूरी प्रक्रिया को टाल दिया गया—जो प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप था।

सीपीएम के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री एम. ए. बेबी ने इसे “संस्थागत स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अभूतपूर्व हमला” बताया। वहीं लेखक पी. शण्मुगम ने चेतावनी दी कि अब पुरस्कार केवल उन्हीं लेखकों को मिलेंगे जो सत्ताधारी विचारधारा के अनुकूल होंगे। ये बयान केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस खतरे की ओर इशारा हैं जिसमें साहित्य को सत्ता के दायरे में समेटा जा रहा है।

यह वही साहित्य अकादमी है जिसकी स्थापना 1952 की सरकारी प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया था कि सरकार संस्था बनाएगी, लेकिन उसके कार्य में हस्तक्षेप नहीं करेगी। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने इसे विचारों की स्वतंत्रता का मंच माना था। बाद में इसे सोसाइटीज़ रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत स्वायत्त संस्था का दर्जा दिया गया। आज वही ऐतिहासिक पहचान अस्थायी राजनीतिक निर्देशों के नीचे दबती दिख रही है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इस पूरे घटनाक्रम पर उर्दू साहित्य जगत की ओर से कोई ठोस प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। या तो यह खबर वहां तक पहुंची ही नहीं, या फिर चुप्पी को ही विवेक समझ लिया गया। साहित्य की दुनिया में यह मौन कहीं अधिक खतरनाक है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि 2023 के साहित्य अकादमी पुरस्कार बिना किसी सरकारी ‘पूर्व अनुमति’ के घोषित किए गए थे और मार्च 2024 में उनका आयोजन भी हुआ था। फिर इस वर्ष अचानक यह नई ‘अथॉरिटी’ कहां से आ गई? दरअसल यह उस व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें संस्थानों और विचारों को एकरूपता के ढांचे में ढाला जा रहा है।

यह समय लेखकों, बुद्धिजीवियों और पाठकों—सभी के लिए निर्णायक है। यदि साहित्य अकादमी की स्वायत्तता पर यह पहला हमला चुपचाप सह लिया गया, तो कल अभिव्यक्ति और रचना दोनों केवल ‘अनुमत’ सीमाओं में सांस लेंगी। जब शब्दों को अनुमति लेनी पड़े, तब रचना मर जाती है—और यही इस पूरे प्रसंग का सबसे बड़ा खतरा है।

 

 

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