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मोब लिंचिंग: बिहार में नफ़रत की हिंसा, कपड़ा व्यापारी की दर्दनाक मौत ने झकझोर दिया ज़मीर

मोब लिंचिंग की दिल दहला देने वाली घटना में बिहार के नवादा में एक मुस्लिम कपड़ा व्यापारी की धर्म पूछकर हत्या कर दी गई। पूरी खबर, विश्लेषण और पुलिस कार्रवाई पढ़ें—कलम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क।

नवादा (बिहार), 15 दिसंबर 2025

कलम टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क | विशेष रिपोर्ट

मोब लिंचिंग एक बार फिर भारत के सामाजिक ताने-बाने पर गहरा घाव बनकर उभरी है। बिहार के नवादा ज़िले में 50 वर्षीय कपड़ा विक्रेता मोहम्मद अतहर हुसैन की मौत ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आज भी किसी इंसान की जान उसके धर्म से तय होगी। 5 दिसंबर की रात हुई इस बर्बर घटना के बाद, 12 दिसंबर को इलाज के दौरान हुसैन ने दम तोड़ दिया।

हुसैन, जो पिछले करीब बीस वर्षों से नवादा में कपड़ों का व्यवसाय कर रहे थे, साइकिल से घर लौट रहे थे। रास्ते में पंचर ठीक कराने के लिए मदद मांगना उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। कुछ लोगों ने पहले नाम पूछा, फिर पहचान। इसके बाद जो हुआ, वह इंसानियत के इतिहास में दर्ज होने लायक है—पर शर्म के साथ।

धर्म की जांच, फिर दरिंदगी : मोब लिंचिंग 

मोब लिंचिंग की इस घटना में आरोप है कि 15–20 लोगों की भीड़ ने हुसैन को जबरन एक कमरे में बंद किया। हाथ-पैर बांधे गए। लोहे की रॉड, ईंटों और डंडों से बेरहमी से पीटा गया। उंगलियां तोड़ी गईं। प्लास से कान और उंगलियों के सिरे कुचले गए। पेट्रोल डालकर ज़िंदा जलाने की कोशिश हुई। यहां तक कि उनके निजी अंगों की जांच कर धर्म “साबित” कराया गया।इलाज के दौरान रिकॉर्ड किए गए वीडियो बयान में हुसैन ने बताया कि एक व्यक्ति उनके सीने पर चढ़ गया, सांस रोक दी गई और मुंह से खून निकलने लगा। गर्म लोहे से शरीर दागा गया, जिससे चमड़ी तक उधड़ गई।

मोब लिंचिंग

रात करीब 2:30 बजे डायल 112 पर कॉल के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और गंभीर हालत में हुसैन को बचाया। उन्हें पहले रोह पीएचसी, फिर नवादा सदर अस्पताल और बाद में विम्स पावापुरी रेफर किया गया, जहां उन्होंने आख़िरी सांस ली।

अब तक पुलिस आठ लोगों को गिरफ्तार या हिरासत में ले चुकी है। जिन नामों की पुष्टि हुई है उनमें सोनू कुमार, रंजन कुमार, सचिन कुमार और श्री कुमार शामिल हैं। पुलिस का कहना है कि बाकी आरोपियों की तलाश जारी है। हुसैन की पत्नी शबनम परवीन ने FIR में साफ़ कहा है कि उनके पति को झूठे चोरी के आरोप में पकड़ा गया और फिर धर्म के नाम पर यातना दी गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि घटना के दिन पुलिस ने पहले उनके पति पर ही मामला दर्ज किया, ताकि असली अपराध से ध्यान भटकाया जा सके।

हुसैन अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले थे। पत्नी और बच्चों के सामने अब रोज़ी-रोटी का संकट खड़ा है।

यह घटना सिर्फ़ मोब लिंचिंग नहीं है—यह उस मानसिकता का आईना है, जिसमें भीड़ खुद को अदालत, जज और जल्लाद समझने लगती है। सवाल यह नहीं कि कितनी गिरफ़्तारियां हुईं, सवाल यह है कि ऐसी सोच पैदा क्यों हो रही है। जब धर्म पूछकर इंसान की चमड़ी जलाई जाए, तो यह सिर्फ़ अपराध नहीं, यह लोकतंत्र की हार है। अगर क़ानून का डर होता, तो भीड़ इतनी बेख़ौफ़ न होती। आज ज़रूरत है कि ऐसी घटनाओं को “अपवाद” कहकर नहीं, बल्कि “ख़तरे की घंटी” मानकर देखा जाए।

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