भारत में दवाओं की बढ़ती कीमतों और स्वास्थ्य-व्यापार से जुड़ी मुनाफाखोरी पर आधारित यह रिपोर्ट संसदीय समिति के चौंकाने वाले खुलासों को सामने लाती है।
By Qalam Times News Network | नई दिल्ली | 04 दिसम्बर 2025
संसदीय समिति की रिपोर्ट में मेडिकल सेक्टर की लूट का पर्दाफाश
स्वास्थ्य-व्यापार—यही वह शब्द है जो पूरी स्थिति को साफ-साफ बयान करता है। विज्ञान और तकनीक ने मानव सभ्यता की राह को रोशन किया है और मेडिकल साइंस इसकी सबसे बड़ी मिसाल है। कभी मामूली बुखार, हैजा या चेचक जैसे रोग मौत का संदेश बन जाते थे, लेकिन आज नई दवाओं और आधुनिक इलाज ने औसत उम्र को बढ़ाया है और तकलीफें कम की हैं। यह सब वैज्ञानिकों की अथक मेहनत का परिणाम है। पर दुख की बात यह है कि यही महान उपहार अब हमारे देश में स्वास्थ्य-व्यापार नाम के एक निर्दयी धंधे में बदल चुका है, जहाँ दवा मदद नहीं बल्कि कमाई का हथियार बन गई है।

दूसरे पैराग्राफ में आते ही स्वास्थ्य-व्यापार का असली चेहरा सामने आता है। हाल ही में लोकसभा में पेश संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट ने दवाओं की कीमतों में फैली भयावह लूट को उजागर किया है। संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन यह रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें बताया गया कि दवाओं का दाम कैसे सप्लाई चेन में ऊपर बढ़ते-बढ़ते आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाता है।
रिपोर्ट में दिए आँकड़े चौंका देने वाले हैं—
- एक सामान्य एंटी-एलर्जिक दवा स्टॉकिस्ट को ₹1.85 में मिलती है, लेकिन मरीज से ₹21 वसूले जाते हैं।
- एक और दवा थोक में ₹11.25 की है, मगर दुकानों पर ₹114 में बिक रही है।
- एसिडिटी की दवा ₹13.95 से बढ़कर ₹170 MRP तक पहुँचती है।
- कैल्शियम कार्बोनेट जैसे जरूरी सप्लीमेंट की कीमत स्टॉकिस्ट के लिए ₹16.95, लेकिन उपभोक्ता के लिए ₹327 हो जाती है।
कुछ दवाओं पर मुनाफाखोरी 1000% से भी ज्यादा है—कुछ मामलों में यह 1272% तक पहुँचती है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा कौन सा जादू है जो सस्ती दवा को सिर्फ हाथ बदलने भर से आसमान छूने वाली कीमत बना देता है?
रिपोर्ट ने पूरी प्रक्रिया साफ की—
PTS (Price to Stockist) → PTR (Price to Retailer) → MRP।
इन तीन चरणों के बीच ही कीमतें जमीन से आसमान तक पहुँच जाती हैं और भारी मुनाफा कुछ गिने-चुने लोगों की झोली में जाता है। समिति का सीधा सवाल है—सरकार आखिर क्या कर रही है?
यह भी चौंकाने वाली बात है कि जिस देश में राजनीतिक संकेत के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता, वहीं स्वास्थ्य जैसे जीवनरक्षक क्षेत्र में चल रही खुली लूट पर सरकारी गलियारों में सन्नाटा है। रिपोर्ट खुद सरकार से जुड़ी समिति ने पेश की है, यानी सरकार सब जानती है।
एक ओर वैज्ञानिक लोगों की जान बचाने के लिए अपना जीवन लगा देते हैं, दूसरी ओर मुनाफे के लालची लोग उन्हीं दवाओं को इतनी महंगी बना देते हैं कि गरीब और मध्यम वर्ग इलाज तक नहीं करा पाता।
अच्छा इलाज और जीवन जीने का अधिकार हर नागरिक का बुनियादी अधिकार है। सरकार किसी भी कारण से इसे छीन नहीं सकती। अब समय है कि सरकार कड़े कदम उठाए, इस मुनाफाखोरी के जाल को तोड़े और दवाओं को आम आदमी की पहुँच में लाए—वरना विज्ञान की सारी तरक्की बेकार है अगर एक इंसान दवा न खरीद पाने के कारण मौत के करीब पहुँच जाए।






