निर्वासन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला—गर्भवती सोनाली खातून और बेटे को बांग्लादेश से वापस लाने का आदेश। जानें पूरी कहानी, सरकारी रुख और अदालत की सख्त टिप्पणियाँ।
By Qalam Times News Network | नई दिल्ली | 03 दिसम्बर 2025
निर्वासन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
निर्वासन का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। निर्वासन को लेकर चल रही बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह स्पष्ट दिशा दी है कि जबरन बांग्लादेश भेजी गई गर्भवती सोनाली खातून और उनके आठ वर्षीय बेटे को तुरंत भारत वापस लाया जाए। कोर्ट के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद केंद्र ने मानवीय आधार पर दोनों को आधिकारिक चैनलों से लौटाने पर सहमति जताई है।
सुनवाई के दौरान सरकार ने कहा कि यह कदम सिर्फ मानवीय दृष्टिकोण से उठाया जा रहा है और इससे निर्वासन आदेश के मूल कानूनी मुद्दे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को आश्वस्त किया कि मां और बच्चे की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए कि सोनाली को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराया जाए और बच्चे की दैनिक देखभाल में कोई कमी न छोड़ी जाए। अगली सुनवाई 10 दिसंबर को होगी।
सोनाली के पिता भोदू शेख का आरोप है कि मई 2025 में शुरू हुई पहचान प्रक्रिया के नाम पर दिल्ली-एनसीआर में बंगाली बोलने वाले मुस्लिमों को निशाना बनाया गया। उनके अनुसार, बिना जांच के सोनाली, उनके पति और बच्चे को हिरासत में लेकर 26 जून को बांग्लादेश भेज दिया गया।
उन्होंने कलकत्ता हाईकोर्ट में बताया कि वे और उनका परिवार पश्चिम बंगाल के स्थायी निवासी हैं और रोज़गार की तलाश में दिल्ली गए थे—लेकिन भाषा और पहचान के आधार पर उन्हें अवैध प्रवासी मान लिया गया।
हाईकोर्ट की टिप्पणी और केंद्र की अपील
कलकत्ता हाईकोर्ट ने सितंबर में सरकार को परिवार को वापस लाने का आदेश दिया था। लेकिन केंद्र ने दस्तावेजों की कमी का हवाला देते हुए इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
जस्टिस जॉयमलया बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि भोदू शेख भारतीय नागरिक हैं, तो डीएनए टेस्ट से उनकी बेटी और पोता भी भारतीय माने जाएंगे।
दिल्ली-एनसीआर में पहचान के नाम पर हजारों परिवार प्रभावित
दिल्ली-एनसीआर के कई इलाकों में पिछले वर्षों में बंगाली भाषी मुस्लिमों को बांग्लादेशी बताकर बड़े पैमाने पर हिरासत और निर्वासन की घटनाएँ हुईं। कई लोगों के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी और लंबे समय से निवास के प्रमाण मौजूद थे, फिर भी उन्हें अवैध प्रवासी कहकर भेज दिया गया। सबसे गंभीर स्थिति गुरुग्राम में देखी गई, जहां 2023–24 में सैकड़ों परिवारों को उठाकर बांग्लादेश बॉर्डर पर छोड़ दिया गया। घरेलू कामगारों की कमी से कई सोसाइटीज महीनों प्रभावित रहीं।
सोनाली खातून का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा—इसलिए उनकी आवाज सुनी गई। लेकिन यही सवाल हवा में तैर रहा है: ऐसी कितनी सोनाली खातून आज भी डिटेंशन सेंटरों या सीमा पार खड़ी हैं, जिनकी ओर किसी की नजर नहीं गई?
सोनाली के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उनकी उम्मीद है कि मां-बेटे की सुरक्षित वापसी जल्द सुनिश्चित होगी।यह मामला नागरिकता सत्यापन प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता और मानवीय दृष्टिकोण की जरूरत को फिर सामने लाता है।






