Reservation विवाद पर विस्तृत रिपोर्ट—सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों, जाति–वास्तविकताओं और समान प्रतिनिधित्व की बहस पर गहरा विश्लेषण।
By Dr. Mohammad Farooque
Qalam Times News Network
Kolkata, 27 Nov. 25
Reservation पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की पुरानी बहस को फिर जगा दिया है।
Reservation को लेकर देश में एक बार फिर गहरी बहस छिड़ गई है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की हालिया टिप्पणी ने न्यायपालिका के रुख और भारत की सामाजिक वास्तविकताओं पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
मंगलवार को, जब वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जे. मलया बागची की पीठ के सामने यह मुद्दा उठाया कि 50 प्रतिशत की सीमा को कड़ाई से लागू करने पर कई आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ओबीसी को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाएगा, तब मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि समाज को जाति–आधार पर विभाजित नहीं होना चाहिए। लेकिन भारत की लंबी सामाजिक असमानताओं के बीच reservation एक ऐसे सुधारक उपाय के रूप में उभरा है, जिसे “विभाजन” कहकर खारिज करना वास्तविकता से दूरी बनाने जैसा है।
यह पहलू भी महत्वपूर्ण है कि जस्टिस सूर्यकांत एक ब्राह्मण परिवार से आते हैं। भले ही उनके पिता जाति–भेद के विरोधी थे और बच्चों के नाम संस्कृत पर आधारित रखे, लेकिन “समाज को विभाजित नहीं होना चाहिए” जैसी बात उन विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों की उस पुरानी सोच की गूंज लगती है, जो किसी भी सुधारात्मक कदम को तुरंत “विभाजन” का लेबल दे देते हैं। भारत में जाति कोई सैद्धांतिक बहस नहीं, बल्कि एक कठोर सामाजिक हकीकत है जिसने सदियों तक वंचित समुदायों को शिक्षा, रोजगार और सत्ता से दूर रखा। संविधान में reservation इसी ऐतिहासिक अन्याय को संतुलित करने और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने के लिए शामिल किया गया था।
न्यायिक प्रक्रिया बताती है कि मामला कितना जटिल है। ओबीसी आरक्षण पर रोक दिसंबर 2021 में लगी, जब सुप्रीम कोर्ट ने “ट्रिपल टेस्ट” पूरा न होने के आधार पर रोक लगाई। इसके बाद राज्य सरकार ने जयन्त कुमार बंथिया आयोग बनाया, जिसकी रिपोर्ट जुलाई 2022 में आई। मई 2025 में अदालत ने चुनाव कराने की अनुमति तो दी, लेकिन 50% सीमा के भीतर। मौजूदा सुनवाई की जड़ यही है कि सीमा लागू होने पर कई क्षेत्रों में ओबीसी प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। मुख्य न्यायाधीश का यह सवाल—“ओबीसी को पूरी तरह बाहर रखकर लोकतंत्र कैसे चलेगा?”—महत्वपूर्ण है, मगर जाति–वास्तविकता से हटकर “विभाजन न हो” पर जोर देना ज़मीनी हालातों से मेल नहीं खाता। इंदिरा जयसिंह ने स्पष्ट कहा—“हम तो सिर्फ अनुपातिक प्रतिनिधित्व चाहते हैं,” जिससे साफ है कि मांग विभाजन की नहीं बल्कि न्याय की है।
जस्टिस सूर्यकांत का जीवन–यात्रा भी दिलचस्प है। 24 नवंबर को उन्होंने भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उनका कार्यकाल 15 महीने का है और वे 9 फरवरी 2027 को सेवानिवृत्त होंगे। हरियाणा से आने वाले वे पहले व्यक्ति हैं जो इस सर्वोच्च पद तक पहुँचे। उनका बचपन संघर्ष और सादगी से भरा था। लेकिन फरवरी 2025 में एससी–एसटी वकीलों के आरक्षण मुद्दे पर भी उन्होंने यही कहा था कि “बार को जाति या धर्म आधारित विभाजन की अनुमति नहीं दी जाएगी”—जो बताता है कि वे एक आदर्श, अविभाजित समाज की कल्पना को प्राथमिकता देते हैं, भले ही वह वास्तविकता से दूर क्यों न हो।
ओबीसी आरक्षण का मामला अभी विचाराधीन है और अदालत ने सभी पक्षों से लिखित जवाब मांगे हैं। अब न्यायपालिका के सामने चुनौती यह है कि 50% की संवैधानिक सीमा और वंचित तबकों के न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व के बीच ऐसा संतुलन तलाशा जाए जो कानून के साथ–साथ सामाजिक न्याय की कसौटी पर भी खरा उतरे।






