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Legacy पुनर्स्थापित: शमीम अहमद ने नेहरू की दृष्टि को जन्म-जयंती पर फिर से रेखांकित किया

नेहरू की जन्म-जयंती पर शमीम अहमद ने उनके स्थायी legacy को दोबारा रेखांकित किया, जिसमें लोकतंत्र, मानव गरिमा और समावेशी राष्ट्र-निर्माण की सोच को केंद्र में रखा गया है।

By Qalam Times News Network
Dateline: New Delhi

Legacy पर फिर रोशनी

Legacy

Legacy पर ज़ोर देते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ता और हिंदी-उर्दू अकादमी के संरक्षक शमीम अहमद ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्म-जयंती पर कहा कि नेहरू की सोच आज भी भारत के नैतिक और लोकतांत्रिक चरित्र को दिशा देती है। उनका मानव गरिमा पर भरोसा, वैज्ञानिक दृष्टि और सवाल पूछने की क्षमता पर आग्रह—इन सबने एक ऐसे देश की नींव रखी जो डर और पूर्वाग्रह से ऊपर उठने की कोशिश करता है।

आज की परिस्थितियों में Legacy का महत्व

legacy

असल बात यह है कि यह legacy सिर्फ इतिहास की बात नहीं है। शमीम अहमद का कहना था कि मौजूदा समय में, जब संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक स्पेस पर पहले से कहीं ज़्यादा दबाव महसूस हो रहा है, नेहरू की सोच को फिर से गंभीरता से समझने की ज़रूरत है। नेहरू मानते थे कि एक आत्मविश्वासी देश वही है जो स्वतंत्र विचार की रक्षा करे, वंचित समुदायों को न्याय दे और ऐसी संस्कृति बनाए जिसमें बहस को दबाया न जाए—बल्कि स्वागत किया जाए।

लोकतंत्र—हर दिन निभाई जाने वाली ज़िम्मेदारी

शमीम अहमद ने याद दिलाया कि नेहरू के लिए लोकतंत्र कोई अपने-आप चलने वाली चीज़ नहीं था। यह तभी टिका रहता है जब नागरिक साफ़ नज़र, साहस और ईमानदारी के साथ इसकी रक्षा करें। मानवाधिकार, समानता और सांस्कृतिक उदारता—ये नेहरू के लिए राजनीतिक रणनीतियाँ नहीं थीं, बल्कि भारत की पहचान का मूल हिस्सा थीं।

उन्होंने युवा पीढ़ी से कहा कि वह इस legacy को एक जीवित मार्गदर्शक की तरह अपनाए, सिर्फ एक स्मृति की तरह नहीं। शिक्षा, तर्कशीलता और समावेशी राष्ट्र-निर्माण पर नेहरू का विश्वास आज भी उतना ही ज़रूरी है, खासकर तब जब भारत को न्याय, संवेदना और साझा विकास की दिशा में आगे बढ़ाने की बात हो।

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